पोरबदंर के प्रसिद्धमंदिर में
मेरा पिछले दिनों 5 दिन का गुजरात प्रवास रहा। इन दिनों चुनाव की सरगर्मी जोरो पर थी,मै अपना विश्लेषण यहां लिख रहा हूं।
2 महीने पूर्व गुजरात की चुनावी हवा भाजपा के विपरीत दिख रही थी ।जीएसटी की मार,लगातार 22 वर्षों के शासन से उत्पन्न एंटी इनकंबेंसी, हार्दिक पटेल अल्पेश ठाकुर और मेवाणी के अपनी-अपनी जातियों में भाजपा सरकार के विरुद्ध हुए आंदोलन…इस सारे से भाजपा के विपरीत स्थिति देख रही थी। फिर राहुल का एक नए अवतार के रूप में इस बार प्रस्तुत होना भी एक नई चुनोती बना था।किंतु अंतिम 20-22 दिन में भाजपा ने कुशल चुनावी रणनीति व संगठन के बलबूते पर दृश्य पलट दिया।
पेज प्रमुख बनाकर यानी बूथ से भी निचली इकाई पर संगठन तंत्र को खड़ा करने की प्रक्रिया जो बनाई गई वह बेजोड़ थी।फिर चुनाव तंत्र का संचालन जितनी कुशलता से भाजपा कर सकती है, उतने करने वाले रणनीतिकार कांग्रेस के पास नहीं थे फिर भी स्थिति कांग्रेस के उभार की दिख रही थी अंततः जब मोदी स्वयं प्रचार करने उतरे तो उन्हें ध्यान आया कि उनके विकास का इस समय पर जनता के ऊपर अच्छा प्रभाव नहीं है इसलिए एक कुशल और पुराने राजनीतिज्ञ होने के नाते उन्होंने नए नए चुनावी मुद्दे खड़े किए।राम मंदिर, हिंदुत्व,राहुल गांधी का मंदिरों में जाना, यहां तक कि पाकिस्तान व मणिशंकर अय्यर के बयानों को उचित मोड़ देकर पूरी चुनाव की चर्चा को ही मोड़ दे दिया।
कांग्रेस और नौसिखिए आंदोलनकारी ,इस जाल में फसते चले गए और अंतिम दिनों में चुनाव की चर्चा का विषय वह बना जो भाजपा चाहती थी । विकास,प्रांत स्तर में व्याप्त भ्रष्टाचार, आरक्षण इन मुद्दों पर चुनावी बहस होने की बजाए वह राम मंदिर, पाकिस्तान, मणिशंकर के बयान राहुल का जनेऊ धारी होना~ इन विषयों पर चला गया। कांग्रेस रोज़गार व विकास को मुख्य मुद्दा बना ही नहीं पायी।यह एक कुशल नेतृत्व की निशानी होती है कि चुनाव में चर्चा वह अपने मुद्दे पर कराय ना कि विपक्षियों के मुद्दे पर होने दे।इसमें भाजपा सफल रही और 2 महीने पूर्व बनी हुई हवा को अपने रुख में मोड़ने में कांग्रेस और उसका कच्चा नेतृत्व पूरी तरह से विफल रहा।
यह इस बात का भी धोतक है कि कैसे मेहनत,टीम वर्क,संगठन, रणनीति व् दूरदृष्टी से हारी बाजी भी जीती जा सकती है।