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कुछ दिन पूर्व सेल्फी विद कश्मीरी लाल जी(स्टिक से)

कल सायंकल,मैं रोहतक की स्वदेशी कार्यकर्ताओं की टोली में बैठा था।वहां चर्चा निकली कि आजकल युवको का समय व्हाट्सएप,फेसबुक पर बहुत अधिक लगने लगा है, यह कितना उचित है?
तो मैंने कहा यह उपयोगी भी हो सकता है यदि इसका ठीक से उपयोग किया जाए मैंने उनको अपने घर का एक उदाहरण बताया “मेरी बड़ी बहनजी आजकल अमेरिका में रहती हैं। वहां दोनों भांजों ने उनको व्हाट्सएप और फेसबुक चलाना सिखा दिया।इसके कारण वह अकेला तो महसूस करती ही नहीं,बल्कि अपने संस्कृत निश्ठ विचारों को,सारी दुनिया में क्षेपण करती रहती हैं। इससे उनके समय का उपयोग भी होता है और मानसिक संतुष्टि भी बड़ी मिलती है।
उसी प्रकार यह आज बिखरे हुए परिवारों को आपस में जोड़ने का भी सशक्त तंत्र है~फोन-व्हाट्सएप, विडीयोकाल,एसएमएस आदि..
फिर अपनी स्वदेशी चिट्ठी भी तो उपयोग का अच्छा तरीका है।
किंतु एक दूसरा पक्ष भी है। मैं जब 6 दिन पहले ग्वालियर जा रहा था तो मैंने अपने रेल के डिब्बे में गिना। कुल 72 में से 58 सवारियां अपने अपने फोन पर ही लगी थीं। आपस में बात ही नहीं कर रहे थे।
घर में कई बार मेहमान आ जाए तो भी औपचारिक नमस्ते के बाद लोग अपने अपने फोन पर लग जाते हैं। कुछ दिन पहले कश्मीरी लाल जी ने मुझे बताया की एक सर्वे आया है जिसके मुताबिक आजकल के युवकों का प्रतिदिन 6:30 घंटे तक का समय फोन पर लग जाता है जोकि समय की बर्बादी ही है।
इसलिए अगर ठीक ढंग से उपयोग किया जाए तो यह समय को भी बचाता है, संबंधों को को भी जोड़ता है। यदि विवेक ना रखा तो वह संबंधों को खराब करने व समय बर्बादी का कारण भी बन सकता है।
हमारे ऊपर निर्भर है।इसलिए मैंने एक संयम रखा है मैं रात्रि 10बजे से लेकर प्रातः 10बजे तक सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करता।महीने में दो एकादशी के पूरा दिन इसका उपयोग नहीं करता। आप भी करके देखें अच्छा ही लगेगा।
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