गत वर्ष आज के दिन मैं कन्याकुमारी में था। वहां स्वामी विवेकानंद जी की मूर्ति के सामने का चित्र आज फेसबुक ने भेजा तो सोचा उसे स्वदेशी चिट्ठी के पाठकों को भी दिखाते हैं।
मैं और कश्मीरी लाल जी आज सवेरे मदुरई(तमिलनाडु) के संघ कार्यालय से सैर के लिए निकले। परसों से यहां पर स्वदेशी जागरण मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन होने वाला है। उस सिलसिले में हम यहां आए हैं।
अभी हम सैर को निकले ही थे,तो देखा की गली में एक बहिन अपने घर के आगे बहुत अच्छी रंगोली तैयार कर रही है। अब वह बहन अंग्रेजी-हिंदी कुछ भी समझती नहीं।
फिर भी हमने जब उससे बात करने की कोशिश की और पूछा “क्या है यह?”
तो वह उत्साह से लगभग चीख रही थी “पोंगल.. पोंगल!”
यह वहां का त्यौहार है। जिसे हम उत्तर भारत में मकर संक्रांति बोलते हैं। उसका उत्साह, उसकी रंगोली देखकर हम बात करने लगे “की जिस तमिलनाडु के अंदर गत 70 वर्षों से द्रविड़ आंदोलन चल रहा हो। द्रविड़ आंदोलन याने हिंदुत्व विरोधी आंदोलन।”
‘हम आर्य नहीं द्रविड़ हैं’ अंग्रेजों द्वारा रोपे गए विष बीज से निकला आंदोलन। जहां पर राम को जूतों की माला पहनाकर जुलूस निकाले जाते रहे। हिंदी.. हिंदू का विरोध चरम पर रहा।
किंतु अगर कोई आज वहां देखें तो इन 3 दिनों में वहां पर एक भी घर ऐसा नहीं छूटा होगा जहां पर दिवाली की तरह यह त्यौहार ना मनाया जाता हो।
मंदिर में जाना, मीठा प्रसाद, भोजन तैयार करना बधाई देना, दिवाली से भी बढ़कर।
इन्हीं दिनों जलीकट्टू भी होता है जिसके विरुद्ध आए सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी जन दबाव में वापस बदलना पड़ा।
साथ ही हो रहे केरल में शबरीमाला में भी यही गहरे बैठा हुआ हिंदुत्व है।
कश्मीरी लाल जी और मैं बात कर रहे थे कि सैकड़ों वर्षो के आघात के बावजूद भी हिंदुत्व कितना अजर अमर है, कोई यहां आ कर देखे।