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यही होता है नेतृत्व..शहीद के ताबूत को कंधा देते गृहमंत्री राजनाथ सिहं

मैं आज सवेरे जब कार्यालय पर बैठा था तो अपना कार्यकर्ता मनोज मेरे से कहने लगा “हमारे 45 जवान मारे गए हैं,सरकार कुछ करेगी भी या ऐसे बयान ही आएंगे और थोड़े दिन में सब भूल जाएंगे,”
तो मैंने उसको कहा “क्या उड़ी के बाद, सरकार भूल गई थी?”
वह बोला “हां!वह तो ठीक है!”
फिर मैंने कहा “सरकार नहीं,समाज को नहीं भूलना चाहिए। और दूसरी बात है कि भावुकता में आकर कुछ तो भी बोलना और अपने ही नेतृत्व व सरकार को कोसने लगना, इस कमजोरी से भी बचना चाहिए।”
एक बात और भी ध्यान रखें।पंजाब में 1980 से 1990 तक आतंकवाद चला। जब वह लगभग समाप्त हो गया था तो एक बड़ी आतंकी घटना में बेअंत सिंह मुख्यमंत्री व उसके 14 सहयोगियों की बम धमाके में हत्या कर दी गई।
आतंकी समाप्त होते-होते भी कई बार ऐसी घटना कर जाते हैं। कश्मीर में पिछले चार-पांच वर्षों से आतंकवाद को बड़ी शिकस्त मिली है। 400 से ऊपर आतंकवादी मारे गए हैं। बारामुला जिला पूरी तरह से आतंक मुक्त घोषित हुआ है।
तो यह आतंक के खत्म होने का भी संकेत है।
*एक शिवाजी के काल का प्रसंग भी स्मरण आया ।जब अफजल खान शिवाजी को पकड़ने निकले तो उसने गांव जला दिए,मंदिर नष्ट किए। जनता कहने लगी “यह काहे का शिवाजी है,मैदान में आकर लड़ता क्यों नहीं?”
किंतु शिवाजी समय का इंतजार कर रहे थे कि अफजल मैदान से पहाड़ में आ जाए। और वही हुआ भी और अंततः अफजलखान मारा गया।
यानी नेतृत्व पर विश्वास, भरोसा जो रखते हैं वे अंततः विजई होते हैं।आलोचना कर के अपने ही नेतृत्व को दुविधा में नहीं डालना चाहिए।
सीआरपीएफ और मोदी जी दोनों ने कहा है कि भरपूर सजा मिलेगी। स्थान और समय व मात्रा हम सुविधानुसार चुनेंगे।पूरा हिसाब होगा,लेकिन तब तक धैर्य अवश्य रखें।