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अम्मा के साथ विभिन्न फोटो

कल मैं बोकारो से रांची जा रहा था। ट्रेन में भीड़ बहुत थी। तभी एक उबले हुए चने बेचने वाली अम्मा निकली “₹10 का चना-२..!” बोलती हुई।
मेरे साथ वाले ने उससे एक पत्ता ले लिया। तुरंत मुझे आइडिया सूझा और मैंने भी एक पत्ता खरीदा। और खाते हुए बाकी सवारियों को कहा “अरे भाई बहुत स्वाद है! है भी बहुत सस्ता! ₹10 के तो चने ही हैं.. मसाला, नींबू, टमाटर और हरी मिर्च ऊपर से है।

खैर और भी कारण रहा होगा, देखते ही देखते 9 पत्ते अम्मा के बिक गए। अम्मा खुश!!
जब वह अपना छब्बा उठाकर जाने लगी तो मैंने कहा “अम्मा! मैंने तेरे पत्ते बिकवाये, तो मेरे लिए क्या?”

अम्मा घबराई। “एक तो पुलिसवाले नहीं छोड़ते, उस पर यह नया आ गया है।”
कहने लगी “अरे बाबू! कोई खास कमाई तो होती नहीं, तुम्हें क्या दूं?”
मैंने कहा “अरे अम्मा! मुझे तेरे साथ फोटो लेनी है। यही मुझे चाहिए।”

अम्मा मुस्कुराई तो मुझे लगा मुझे लाखों की कमाई मिल गई।
फिर मैंने दूसरी बात जो पूछी तो मैं खुद पर शर्मिंदा भी हुआ, उदास भी। अम्मा ने बताया कि उसको 800 से ₹1000 तक हर महीने पुलिसवालों को देने पड़ते हैं। मैंने पूछा “इतने? एक बुजुर्ग महिला से?”
वह बोली “अरे! जवान से तो 15-16 सौ रुपया महीना लेते हैं। क्या करें बबुआ?”

उसको तो कुछ नहीं कहा पर मुझे ग्लानि इसलिए हो रही थी कि अभी तक हम लोग, इन धूर्त पुलिस वालों से इन लोगों को बचाने के लिए कुछ ठोस नहीं कर पाए। लेकिन मैंने सोचा कि इस विषय में स्वदेशी के कार्यकर्ताओं को कुछ करना होगा जरूर।

देश में लाखों फेरीवाले, रेहड़ी वालों की कमाई का एक हिस्सा तो यह सरकार (पुलिस-प्रशासन के लोग) ही चट कर जाते हैं। यदि हम इस समस्या का हल ढूंढ पाए तो अपने लाखों लोगों की प्रतिदिन की आय का स्तर अपने आप ही बढ़ जाएगा। यही प्रभु से प्रार्थना भी है।