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आज कश्मीरी लाल जी व अन्य दो कार्यकर्ताओं के साथ स्वदेशी का विचार वर्ग पूर्ण कर माऊंटआबू जाना हुआ। ब्रह्मकुमारी मिशन का वहां केन्द्र भी है।
वहां के प्रसिद्ध जैन मंदिर में दर्शन कर जब हम वापिस आने लगे तो सहयोगी कार्यकर्ता ने कहा कि यह अम्मा अच्छा नीबूं सोडा बनाती है,मैने पहले भी पिया है।तो सहज बात मान,हमने सोडा पिया। फिर हम पीस पार्क देखने गए, एक होटल में चायपान किया।
इस सारे में कोई एक घन्टा लग गया। किन्तु जैसे ही बाहर आए तो ध्यान आया कि मेरा टैबलेट कहीं नहीं दिख रहा। हम थोड़ा परेशान हुए,फिर अनुमान लगाया कहां कहां रूके। तो सबका मत बना,कि दो स्थान पर ही रूके हैं,इस बीच।
हमारे साथ गए कार्यकर्ता डा:महेश श्रीमाली ने कहा “सतीशजी! मुझे पक्का विश्वास है कि अगर उस अम्मा के पास रहा होगा तो अवश्य मिलेगा क्योंकि मेरा विश्वास है कि ये गरीब लोग निहायत ईमानदार होते हैं।” हां यदि चाय जहां पी थी उस होटल पर रह गया है तो मैं कुछ नहीं कह सकता।
हम वापिस दौड़े।पहले दुकान वाले ने इन्कार किया।तो तुरन्त अम्मा की रेहड़ी की और भागे। वहां पहुंचते ही वो बोली “मैं तो इन्तजार ही कर रही थी,यह लो अपना बड़ा फोन।”
हम सबके चेहरे खिल उठे।हमने उस अम्मा के पैर छूए,कुछ राशि भेंट की…जिसे उसने हमारे बड़े आग्रह पर ही स्वीकार किया।
फिर सब अपने पुराने अनुभव बताने लगे गरीबों की ईमानदारी के। निष्कर्ष यही था जो ऊपर लिखा है।