“युगो- युगो से यही हमारी बनी हुई परिपाटी है
खून दिया है मगर नहीं दी कभी देश की माटी है!”

कल लद्दाख की गलवान घाटी में जो हुआ उसने यह बता दिया है कि अब 1962 का कमजोर भारत नहीं रहा। बल्कि अब 2020 का भारत जागृत है व उसकी सेना सशक्त है।

गलवान घाटी से भी दोनों सेनाओं की वापसी होनी थी, दोनों देशों के जनरल की बैठक में यह तय हो चुका था। वास्तव में चीनी सेना पीछे हट भी गई थी, किंतु उन्होंने वहां पर अपना कच्चा निर्माण बने रहने दिया था। क्योंकि सवेरे भारतीय टुकड़ी को भी वहां से वापस आना था इसलिए कमांडिंग ऑफिसर संतोष व उनके साथ 65 फौजी रात 11:30 पर सुनिश्चित करने गए कि हमारी जमीन से चीनी पूरी तरह से हटे हैं कि नहीं, पर जब उन्होंने देखा कि चीनी सैनिक तो पीछे हटे हैं किंतु स्ट्रक्चर खड़ा है, तो वह स्ट्रक्चर को तोड़ने और जलाने लग गए।

यह देख लगभग ढाई सौ चीनी सैनिक जो आधा किलोमीटर दूर थे, कील लगे डंडे, लोहे वाले ग्लव्स व काँटेदार तारे आदि लेकर आ गए और सीधे हमला कर दिया जिसमें कर्नल व दो अन्य फौजी शहीद हो गए। दिल्ली से स्पष्ट ऑर्डर थे इसलिए 40 मिनट बाद ही अपनेे भी 400 फौजी वहां पहुंच गए फिर जो घमासान हुआ (14000 फुट की ऊंचाई पर, माइनस डिग्री टेंपरेचर में) तो इस खूनी संघर्ष था कुल 43 चीनी सैनिक मारे गए कुछ गंभीर घायल भी हैं।

भारत ने भी अपने 20 जवान खो दिए हैं। चार अभी भी गंभीर हालत में हैं।
जो भी हो, एक बात पक्की है की 1962 की तरह अब जमीन नहीं हथिया पाएगा चीन। एक-एक इंच के लिए भारतीय सैनिक भी डटे हैं। क्योंकि उन्हें स्पष्ट आदेश हैं व मनोबल भी उनका ऊंचा है। हां! “…जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी…” लता मंगेशकर का गीत फिर से याद तो आ ही रहा है…
~सतीश