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गत दिनों फरीदाबाद के कार्यकर्ता पंकज जी के घर,कश्मीरी लाल जी के साथ जाना हुआ। उनकी बहिन जी जो एक एक्सीडैंट के कारण व्हीलचेयर से ही चल सकती हैं, किन्तु गजब की ईच्छा शक्ति है, वे अब हरियाणा पिस्टल शूटिंग की दो बार की गोल्ड मैडलिस्ट हैं, दुबई भी मैच खेल कर आईं हैं। उनके व परिवार के जज्बे को सलाम।

मेरा वोट पंजाब के पठानकोट में बना हुआ है। जहां पर 19 मई को वोट है।
“वोट डालने जाना ही चाहिए।” ऐसा मुझे कश्मीरी लाल जी ने स्पष्ट कह दिया था। फिर भी आज और कल मैं जो काम लेकर बैठा था, उसमें 19 तारीख को पठानकोट पहुंचना बहुत कठिन लग रहा था(मन की कमजोरी समझो)

मैंने एक विकल्प सोचा कि पठानकोट के कार्यकर्ताओं से बातचीत करके, ऐसे चार-पांच लोगों को चिन्हित करें,जो वोट नहीं डालने वाले थे, तो अगर मैं आग्रह पूर्वक उनके वोट डलवा देता हूं,तो मेरे 1 वोट का हिसाब हो जाएगा। यह वैसे तो उचित नहीं था किंतु मन में एक विचार इस प्रकार का बन गया था।

किंतु आज सुबह मुझे डॉ आशीष मेहता मिले और उन्होंने कहा कि उनका चचेरा भाई जो दिल्ली का रहने वाला है,पर आजकल इटली में एक बड़ी कंपनी में जॉब करता है,वह 11 तारीख को आया और वोट डालकर 12 तारीख को वापस चला गया। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ।
वैसे तो फरीदाबाद के अपने दिगंबर व अनिता नासवा जी मलेशिया से वोट डालने हेतु आए ही हैं। और फिर बेंगलुरू के एक व्यक्ति की कहानी तो बड़ी वायरल हुई है जो आस्ट्रेलिया से वोट डालने के लिए आना चाहता था। उसकी कंपनी ने छुट्टी नहीं दी तो वह इस्तीफा देकर आ गया और कहा “मुझे अपनी योग्यता के आधार पर नौकरी दोबारा मिल ही जाएगी किंतु मोदी को लाना तो जरूरी है और इसी बहाने में 10-12 दिन देश के नाम लगा जाऊं।”
जैसे ही मुझे यह सब बातें ध्यान में आईं तो मैंने तुरंत अपना पठानकोट के लिए टिकट बुक करा दिया।
“वोट …तो सबको डालना ही चाहिए।”
एक निष्कर्ष: अगर किसी अच्छे काम को करने में मन कमजोर पड़ने लगे,तो प्रेरक प्रसंग या प्रेरक व्यक्तियों का स्मरण कर लेना अच्छा रहता है