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मैं आज नागपुर से दिल्ली आ रहा हूं। तो साथ वाली सीट पर एक महिला जो तेलुगू थी व उसका एक बच्चा था जिससे मैंने बात करनी शुरू की।”क्या नाम है, तुम्हारा? पापा व मम्मी का नाम बताओ?
वह बोला “दिग्विजय..फर्स्ट क्लास में पढ़ता हूं!पापा का नाम अशोक व मम्मी का प्रवीणा है।”
मैंने कहा अपना नाम तो ठीक पर पापा मम्मी के नाम बोलते हुए आगे श्रीमान और श्रीमती लगाना चाहिए।

फिर मैंने “पूछा जन-गण-मन आता है,क्या?”
क्योंकि उसके पिता एयरफोर्स में है। तो यह आना ही चाहिए था,किंतु वह बीच में अटक गया।
खैर मैंने उसको पूरा याद करवाया फिर एक देश भक्ति गीत दिया वह भी उसने थोड़ा याद किया।
तो मैंने उससे पूछा “पढ़ाई अच्छी करते हो?”
तो वह बोला हां! शाम को टूयशन रोज जाता हूं।”
तब मैंने उसकी मां से बात की “आप जॉब करती हैं?तो वह बोली “नहीं!मैं घर पर ही होती हूं और पोस्ट ग्रेजुएट हूं।”
तो मैंने कहा “फिर उसको ट्यूशन पर क्यों भेजती हो? स्वयं क्यों नहीं पढ़ाती?
इसके अलावा भी मैंने पूछा “उसको गेम में डाला है क्या? उसको जन गण मन पूरा क्यों नहीं आता यह किसकी जिम्मेदारी है? आप उस पर पूरा समय क्यों नहीं लगाती?”
तो वह बहनजी कहने लगी यह मेरी मानता नहीं।मैंने मजाक में कहा “इसके पापा मान लेते हैं ना?तो यह क्यों नहीं मानता। आपने इस को थप्पड़ लगाया है क्या?”

तो मैंने उन्हें संस्कृत का सुभाषित सुनाया “पंच वर्षानि लालयेत, दश वर्षानी ताड़येत्…”
फिर मैंने उस बहिनजी को कहा “ध्यान करिए! यह बच्चा ठीक से विकसित हो इसके लिए गंभीरता से विचार पूर्वक समय लगाना चाहिए।तुम फौजी की पत्नी हो,इसको एक अति योग्य व देशभक्त व्यक्ति के नाते से विकसित करना यह तुम्हारा सबसे बड़ा कर्तव्य है।” खैर उस बहन जी ने हामी भरी।
किंतु हम सब सोचें,कि हम परिवार में बच्चों पर ठीक, पूराऔर गंभीरता से समय लगाते हैं क्या? भविष्य में कोई शिकायत ना रहे इसके लिए उसके बचपन में ही पूरे तरीके से संस्कारित करना चाहिए।
~सतीश कुमार