“तुम्हारी हिम्मत कैसे पड़ी मेरे पोते को बर्तन साफ करने के काम में लगाने के लिए?” दादी ने डांटते हुए अपने अपने 8 क्लास पढे पौत्र के चाचा को कहा(चाचा एक काफ़ी केन्टीन चलाता था व् भतीजे को काम में लगा लिया था)और दादी उसे पकड़ कर घर ले आई ।उसको ₹500दिए (1976 में यह बड़ी राशि थी)”तुम कोई अपना काम शुरु करो।तुम्हें मै नौकर नहीं मालिक देखना चाहती हूँ” और उसने बनियान तोलिया बेचने का काम शुरू किया।किंतु उसमें उसको सफलता हाथ नहीं लगी, वह पैसा भी गंवा बैठा। उदास होकर वह फिर दादी के पास आया तो दादी ने कहा “चिंता नहीं करो,मेरे पास काफी पैसा है” और उसने उसे ₹1000 दिए कि अब फिर काम शुरू करो।तो भरत ने एक पार्टनर साथ मिलाया। व बनियान बनाने का एक व्यवसाय शुरू किया।व्यवसाय अच्छा चल निकला।और यह धीरे-धीरे एक लाख तक का काम करने लगा। किंतु पारटनर ने धोखा कर दिया व उसने चतुराई से इसे बाहर निकाल दिया।अब दादी ने कहा “कोई बात नहीं मेरे पास सोना और कुछ पैसे हैं इसे ले जाओ पर अब पार्टनरशिप नहीं करना अपना ही काम शुरू करना।” उसने अपनी फैक्ट्री चलाई,बहुत अच्छी चली।वह लगभग 50 करोड़ का काम करने लग गया। एक्सपोर्ट भी करने लग गया।किंतु रशिया के साथ एक बड़ी डील में उसका भारी नुकसान हुआ।वह भारी कर्जे में आगया।फैक्ट्री बंद होने के कगार पर आ गई ।तो दादी ने कहा “तुम चिंता नहीं करो, मै अभी जिन्दा हूँ,मेरे पास अभी 8 एकड़ जमीन है,उस में से 4 एकड़ जमीन को बेच कर तुम अपना काम करो” और उसने फिर से अपनी फैक्ट्री शुरू की।आज वह दुनिया का अंडरगारमेंट्स का एक बड़ा ब्रांड है।तिरपुर का VIKING! भरत यह बताते हुए अपने आंसू नहीं रोक पाते। आज यह 1200 करोड़ का ग्रुप है कोई 1800 लोग विशेषत: महिलायें इसमें काम पाती हैं।इस कथा को आईआईएम बेंगलुरु के प्रोफेसर वैद्यनाथन ने एंटरप्रेन्योरशिप की सफलता का आधार भारतीय परिवार,बताते हुए सुंदरम जी को सुनाई। परिवार के सहयोग से उद्यमिता…यही है भारत का आधार…