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कल भुबनेश्वर के उत्कल विश्विद्यालय में चुने हुए छात्रों के साथ विचार गोष्टी के मुद्दे थोड़े अलग थे। उनकी ज्यादा उत्सुकता 5 खरब (ट्रिलियन) डॉलर की अर्थव्यवस्था बनेगी क्या, बिना एफडीआई के विकास संभव है क्या, हमारा देश चीन जैसे सस्ता, जापान जैसा गुणात्मक सामान क्यों नहीं बना सकता, स्वदेशी कैसे लोकप्रिय हो सकता है? आदि, आदि थी। जितने उन्होंने
हाल में प्रश्न पूछे उससे ज्यादा बाहर आकर पूछे।

नोकरी की अपेक्षा स्वरोजगार, व उद्यमिता भी एक विषय बनता जा रहा है। उनकी आँखों मे सपने हैं, उत्साह है, पर थोड़ा खालीपन भी है, बेरोजगारी को लेकर उहापोह ज्यादा है, स्थानीय राजनैतिक नेतृत्व भी प्रश्नों के घेरे में रहता है। आर्थिक क्षेत्र में एक क्रांति सबको दरकार है।

कैफ़ी आज़मी की बात याद आती है:
सब अपने पाँव पे रख-रख के पाँव चलते हैं
ख़ुद अपने काँधे पे हर आदमी सवार सा है
कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है “