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विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी में, स्वामी जी की प्रतिमा के साथ कश्मीरी लाल जी

गत सप्ताह जब मैं व कश्मीरी लाल जी मदुरई सम्मेलन के बाद कन्याकुमारी गए तो वहां हम आपस में चर्चा कर रहे थे “संघ में तो प्रचारक निकालने की एक लंबी प्रक्रिया है, किंतु बाहर के संगठन कैसे अपने पूर्णकालिक कार्यकर्ता, सन्यासी निकालते हैं?”
हमारी चर्चा में आया “इसी विवेकानंद केंद्र के ही कोई 300 सेवाव्रती हैं जिन्हें स्वामी विवेकानंद का जीवन व विचार पढ़ा कर,एकनाथ रानाडे ने निकालने में सफलता प्राप्त की।”
दूसरी तरफ रामकृष्ण मिशन जिसे स्वामी विवेकानंद ने स्थापित किया उसके 600 से अधिक सन्यासी हैं। अधिकांश अति उच्च शिक्षित रहते हैं।
इसके अलावा भी हमारी चर्चा आई कि श्री श्री रविशंकर,जग्गी वासुदेव के सन्यासी अत्यंत उच्च शिक्षित व वर्तमान की परिस्थितियों के अनुरूप रहते हैं।
अपने परिवार संगठनों में भी विद्यार्थी परिषद,मजदूर संघ व एकल विद्यालय अपने पूर्णकालिक निकालता ही है।
स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा इन सब प्रकार के सन्यासी, प्रचारक,पूर्णकालिक,सेवाव्रतियों को रहती ही है।
स्वामी विवेकानंद जिए,केवल 39 वर्ष।
दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने एक बार कहा था
“Not the longevity of the life, but Shadow of one’s, on the history of mankind makes a Man Great.”

यह चर्चा करते हुए मुझे कश्मीरी लाल जी ने कहा “अपने स्वदेशी जागरण मंच में भी पूर्णकालिक या स्वदेशीव्रती कार्यकर्ताओं की प्रक्रिया खड़ी करने की हमें योजना करनी होगी!”
मैंने भी स्वीकार किया कि इस विषय में हमारे कार्यकर्ताओं को अधिक गहराई से,चिंतन करना बाकी है।” फिर भी भविष्य उज्जवल है…