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माता गौरी कंचन सोनी जी का चित्र
अपने सह सरकार्यवाह माननीय सुरेशजी सोनी की माता जी का कल 91 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गया! फेसबुक पोस्ट पर एक कार्यकर्ता ने लिखा, “दुखद” भगवान उनके परिवार को दुख सहने की हिम्मत दे.. आदि।
मैं सोच में था जी यह सामान्य प्रचलित शब्द लिखे है या उचित भी हैं। क्योंकि 3 माह पूर्व जब मेरे माता जी का भी स्वर्गवास हुआ, तब भी यह प्रश्न मेरे मन में था।
किंतु अगर ऐसा जीवन हो, 91 वर्ष तक स्वस्थ आयु, परिवार न केवल सुखी बल्कि समाज जीवन में कार्यरत, 10 दिन पूर्व भी वे स्वस्थ रह बात करती रही, सब प्रकार की धार्मिक प्रक्रियाएं, यात्राएं वे कर चुकी थीं, 4 पुत्र जीवन में सब प्रकार से सफल व प्रतिष्ठित, तो इससे उत्तम इहलोक की यात्रा क्या हो सकती है?
और फिर आगे जाना यह तो इतना ही सत्य है जितना यह कि कल सवेरे भी सूर्योदय होगा।
ओशो ने कहा, “मृत्यु तो ऐसे हैं जैसे किसी नए क्षेत्र में जाना, नया नगर देखना। इसलिए जब जाना तो बन ठन कर जाना, हंसते मुस्कुराते जाना।” और उन्होंने अपने शिष्यों को यह आदेश भी दिया, “उनकी मृत्यु पर नृत्य हो, भजन हो, त्यौहार जैसा हो, रोना-धोना बिल्कुल न हो।”
वास्तव में हिंदू दर्शन में यह मृत्यु पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहनने के अलावा कुछ नहीं। तो क्यों ना जब सब कुछ ठीक-ठाक होकर जाएं तो शोक नहीं करनाकेवल श्रधाँजलि देना, ऐसा ही मुझे भी 3 महीने पूर्व एक संत ने समझाया था।
~सतीश कुमार