कल मेरा मध्यप्रदेश के शिवपुरी में, अर्थ एवं रोजगार सृजक सम्मान कार्यक्रम में जाना हुआ।
संतजन, सांसद, पुलिस अधीक्षक, संघ के वरिष्ठ अधिकारी, उद्योग पति, कृषक, सब आए थे। हाल पूरा भरा हुआ था। कुल 7 ऐसे लोगों का सम्मान किया गया जो 50-60 से लेकर 250 लोगों तक को रोजगार दे रहे थे। उन्हीं में एक रंजीता देशपांडे बहन थी।

मैंने उस बहनजी से कहा ‘”आप खड़े होकर अपना अनुभव सुनाइए।”
वे बोलीं “मेरा दवाइयों की पैकिंग व सेल-सप्लाई का काम था। लोकल कंपनियों की सप्लाई थी, कोरोना लॉकडाउन लगते ही वह टूट गई। मेरा पैकिंग व सेल करने वाली महिलाओं का जो नेटवर्क था, सारी बेरोजगार हो गई।”

पहले तो 12-15 दिन हम सारी मायूस हो गयीं। पर फिर हमने हिम्मत करके सोचा की लोगों की इस समय की जरूरत क्या है? और फैसला किया की हम फिनाइल, सेनिटाइजर, टॉयलेट क्लीनर, हैंड वाश आदि बनाएंगे। हमारे पास कुछ बेसिक सामान, डिब्बे और पैकिंग करने की मशीनें तो थी हीं।

मैंने पूछा “तुम्हें बनाना आता था, तरीका(टेक्नोलॉजी) कहां से लिया?”
रंजीता देशमुख बोली “हमने यूट्यूब से इसके तरीके सीखे। कई घंटे नहीं, कई दिन तक उसका अध्ययन और अभ्यास किया। फिर हमें यह ठीक से बनाना आ गया।”

मैंने पूछा “कितने लोगों को रोजगार देती हैं?”
वह बोली “12-13 महिलाएं तो इसे बनाने के काम में लगी हैं और 50- 55 महिलाएं सेल व सप्लाई के नेटवर्क में हैं। मेरी बड़ी टीम है। हर एक महिला का 9 से ₹10000 तक बन जाता है, ज्यादा भी। मुझे अपनी कमाई से अधिक खुशी इस बात की है, कि कोरोना के लॉकडाउन के दौरान भी हमने इन सब का रोजगार बनाए रखा और घर, बच्चों को परेशानी नहीं हुई।”

मैंने पूछा “आगे की सोच क्या है?”
तो उन्होंने कहा “इस नेटवर्क को 100-125 तक बढ़ाना है। और महिलाओं को जो कठिनाइयां पेश आती हैं उनसे मुक्ति का भी कोई प्रशिक्षण शुरू करना है। इसके लिए एक शौर्य दल भी हमने बनाया है।”

कार्यक्रम में बोलते हुए मैंने कहा “स्वदेशी का विचार है कि हमें रोजगार मांगने की बजाए, रोजगार देने वाला बनना है। शिवपुरी के इन 7 लोगों ने अपने जीवन से यह कर दिखाया है, इसलिए इनका सम्मान है।”