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कश्मीरी लाल जी महाराष्ट्र के बुलढाणा मे प्रवास पर व मैं गुलबर्गा के एक कालेज में बोलते हुए

परसों मैं जब गुलबर्गा से बेंगलुरु आ रहा था,तब डिब्बे में एक चाय वाला चढ़ा। “चाय..कॉफी..2” कहता हुआ। मेरे सामने वाली सीट पर बैठी महिला जब तक अपना पर्स संभाल चाय मांगने के लिए मुड़ी, तब तक वह आगे निकल चुका था। मैंने आवाज भी लगाई तब भी वह आगे निकल ही गया।
मैंने देखा, वह बहुत जल्दबाजी कर रहा था।और इसके कारण से वह सारे डिब्बे में शायद ही कोई एक दो कप चाय बेच पाया होगा।
और कल मैं जब मैसूर से मदुरई आ रहा था तब भी ऐसा हुआ एक चाय वाला चढ़ा, किंतु वह आराम से आकर हमारे कूपे में खड़ा हो गया। दो बार उसने बोला तो मेरे सामने वाली सवारी का मन बना। उसने चाय ले ली। तो मैंने उससे पूछा “क्या गर्म है?”
उसने कहा “हां!”

तो मैंने भी ले ली। देखा देखी एक तीसरे ने भी ले ली। बाद में मैं सोचने लगा “इन दोनों में क्या फर्क है?”
पहले वाले के पास एक ग्राहक था,किंतु उसको भी चाय नहीं बेच पाया। सारे डिब्बे में भी 2 कप से अधिक नहीं बेच पाया होगा। किंतु यह दूसरा आराम से खड़ा हो गया तो न, न होते भी तीन कप तो यहीं बेच गया और शायद डिब्बे में उसने 12-13 कप चाय बेच ली होगी।

दोनों में एक ही फर्क था। पहले वाला जल्दबाजी कर रहा था,रुक ही नहीं रहा था, सोचने का समय ही नहीं दे रहा था। जबकि दूसरे वाला तसल्ली से खड़ा हो जाता था, धैर्यपूर्वक इंतजार करता था, तो उसको सफलता मिल रही थी।
धैर्य एक बड़ा गुण है। यद्यपि कम ही लोग इस विषय में सोच पाते हैं।