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3 दिन पूर्व जब मैं अयोध्या से वापस निजामुद्दीन स्टेशन पहुंचा तो आर:के:पुरम कार्यालय के लिए मैंने ऑटो किया। ऑटो चालक प्रवीण से बात शुरू हुई “ऑटो, तुम्हारा अपना है क्या? कितनी कमाई करते हो, रहने वाले कहां के हो?”
प्रवीण बोला “मैं कन्नौज का रहने वाला हूं। पिछले 12 वर्ष से ऑटो चला रहा हूं। ₹400 रोज का किराया है।

मैंने पूछा “कितने वर्षों से चला रहे हो? अपना ऑटो क्यों नहीं ले लिया?”
वह बोला “ऑटो तो अपना था, पर पिछले साल बहन की शादी की, तो ढाई लाख का कर्जा चढ़ गया। पत्नी से बात कर ऑटो बेच दिया, नहीं तो ब्याज की किस्त देनी पड़ती।”

फिर मैंने पूछा “आगे की क्या सोच है?”
उसने कहा “25 साल पहले मेरे माता-पिता ने गांव की जमीन बेच, शाहदरा में मकान बनाया था। पर अब सोचता हूं कि वह प्लाट ₹60लाख तक में बिक जाएगा और क्योंकि कन्नौज में भी अब ऑटो चलने लगे हैं,तो गांव में 6-7 एकड़ जमीन ले लेता हूं,इसी पैसे से। घर का घर में रहूंगा, खर्चे कम होंगे और कमाई भी हो ही जाएगी।”

मैंने कहा “अड़चन क्या है?” वह बोला “अभी घर वालों का मन तैयार नहीं हो रहा,आपका क्या कहना है?”

मैंने कहा “घरवालों से पूरी चर्चा कर लो, बहुत अच्छा हो जाएगा। आजकल शहर के पास गांव हो तो सब्जी वगैरह से कमाई अच्छी हो जाती है। एक बार गांव जाकर सारे विषय को अच्छी तरह स्टडी करो।” और कहा कि अगर तू यह काम करने में सफल हो जाए तो मुझे बताना,मेरा नंबर अपने पास रखो वह आश्चर्य से मुझे देखने लगा।

मैंने कहा “जाओ मेरी शुभकामनाएं! तुम अवश्य खेती में सफल होंगे।”
कार्यालय आ गया। ₹141 किराया बना, मैंने बच्चों की टॉफी के लिए ₹10 सहित,150 दिए। और साथ में ले ली एक सेल्फी!
…जाते हुए उसकी मुस्कान कह रही थी, “धन्यवाद ऐसी सलाह व प्रोत्साहन के लिए।
~सतीश कुमार