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कल चंडीगढ़ में स्वदेशी मेले की तैयारियों हेतु हुई बैठक का दृश्य

परसों रात मैं चंडीगढ़ कार्यालय पर पहुंचा। ठंड थी। मुझे जुकाम हो रहा था। तो वहां के अपने ड्राइवर बलकरण जी ने कहा “सतीश जी! आपके लिए तेज गर्म पानी ले आऊं?” मैं मुस्कुरा उठा..!
कल मेरा उपवास था। दिनभर मैंने कुछ खाया नहीं था। रात 9:30 बजे तेज़ भूख लगी। पर मेरे मन में संकोच था(रात देर हो गई थी) फिर भी मैंने अपने कर्मचारी को कहा “खिचड़ी की इच्छा थी! पर मैंने पहले तो तुम्हें बताया नहीं?”

पर यह क्या? तुरंत धर्मसिंह ने खिचड़ी तैयार कर दी। आज दिन में धूप में बैठा था तो सामने छोटा स्टूल था अपने मोनू ने अंदाजा लगाया और आकर पूछा “सतीश जी! आपको बड़ी मेज की जरूरत लगती है नीचे से उठा लाऊं?”ये तीनों अपने से और पूर्वानुमान लगाकर सहयोग,काम करते हैं।

मैंने बाद में सुभाष जी से पूछा कि हमारे यह तीनों कर्मचारी इतने सेवाभावी कैसे हैं? स्वयं सुभाष जी का भी व्यवहार उत्तम होता है। वह मुस्कुरा दिए।
लेकिन मुझे लगता है कि उनका प्रेम पूर्वक प्रशिक्षण इसके लिए जिम्मेदार है। वे तीनों-चारों का बड़ा ध्यान रखते हैं।

मैं सोच में था कि क्या हम लोग भी अपने कर्मचारियों का ध्यान रखते हैं?
दिवाली वाले दिन कश्मीरी लाल जी ने दिल्ली कार्यालय के अपने कर्मचारी को अपनी घड़ी ही दे दी। अगर हम उनका ध्यान रखें, उनके सुख-दुख का परिवार का ध्यान रखें,प्रेम पूर्वक प्रशिक्षण दें तो निश्चित रूप से वह हमारा ज्यादा ध्यान रखते हैं,रखेंगे। फिर किसी को अपने कर्मचारियों से शिकायत का मौका ही नहीं आएगा…जरा सोचिए!