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विवेकानंद केंद्र कन्याकुमारी में सूर्योदय के समय चिंतन

दक्षिण प्रवास पूरा कर के अंतिम दिन मैं कन्याकुमारी पहुंचा। स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक हमेशा से ही देश और दुनिया को अपनी तरफ आकर्षित करता रहा है।
वहां साल भर में, लाखों विदेशी व देशी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं,स्वामी विवेकानंद के जीवन से प्रेरणा पाकर जाते हैं। किंतु बहुत से लोगों को यह नहीं पता कि वास्तव में इस महान शिला स्मारक के शिल्पी एकनाथ रानाडे हैं। जो आजीवन संघ के प्रचारक रहे, संघ के अ:भा:सरकार्यवाह रहे।

वास्तव में जब स्वामी विवेकानंद जी का 1963 में शताब्दी वर्ष आया तो संघ ने यह योजना सोची कि कन्याकुमारी में स्वामी जी के नाम पर एक बड़ा स्मारक खड़ा किया जाए,समुद्र के बीच में ही।
वहां स्वामी जी ने 1892 में 3 दिन तपस्या की थी। इस स्थान पर, मां पार्वती ने एक पैर पर खड़े होकर शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या की थी,इसलिए इसका नाम कन्याकुमारी है।

तब उस क्षेत्र में ईसाइयों का ही बोलबाला था। तमिलनाडु में तब संघ बहुत कमजोर भी था। केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। किंतु एकनाथ जी ने 350 सांसदों के हस्ताक्षर करवा कर और वहां की द्रविड़ सरकार को मना कर, देशभर से धन संग्रह करते हुए यह अत्यंत विराट कार्य पूरा किया। इस महान संगठन व सफल सृजन करता माननीय एकनाथ रानाडे जी के स्मारक को प्रणाम कर, आज फिर से धन्य हुआ।
स्वदेशी के बंधु, बहनों को भी मेरा आग्रह है, कि परिवार सहित छुट्टियों में इस स्मारक को देखने और वहां से प्रेरणा प्राप्त करने के लिए अवश्य जाएं।