कल मैं यमुनानगर के डीएवी कॉलेज फॉर गर्ल्स में ‘रोजगार समस्या एवं समाधान’ विषय पर बोलने के लिए पहुंचा!
35-40 मिनट की मेरी प्रस्तुति के बाद लड़कियों को प्रश्न पूछना था!शुरुआती संकोच के बाद वे खुल गईं। और प्रश्नों की झड़ी लगा दी।उनके प्रश्न सुनकर में हैरान था।
पहला प्रश्न था “सफलता क्या है?वह कौन सा बिंदु है, जब हम कहेंगे कि हम सफल हो गए हैं?” फिर “हम अपनी प्रतिभाओं को पहचाने कैसे?हम अपने कंफर्ट जोन से बाहर कैसे आए? इसे प्रैक्टिकली कैसे अप्लाई करें?यदि हम निरउत्साहित हो जाते हैं,तो उसमें से बाहर कैसे आए? नौकरी करने के लिए माता-पिता ही कहते हैं, स्वरोजगार के लिए वे प्रोत्साहित नहीं करते,उनको कैसे समझाएं?…”
तो मैंने अपनी तरफ से उस उच्च-उत्साही ऑडियंस को पूरे मनोयोग से उत्तर दिए।
मैंने कहा “सफलता कोई एक निश्चित बिंदु नहीं है, जिसे प्राप्त करने पर हम सफल घोषित हो जाएंगे। बल्कि यह सतत चलने वाली जीवन यात्रा है।जब हमारे को मधुर-संबंध,स्वस्थ-तन,सकारात्मक-मन व दूसरों की सेवा-सहयोग करने की लगातार अनुभूति होती रहती है,तो मानो हम सफलता की राह पर आगे बढ़ रहे हैं!
फिर मैंने उन्हें कहा कि आत्मविश्वास व व्यक्तिगत व राष्ट्रीय जीवन में कुछ कर गुजरने की इच्छा ही तुम्हें स्व उद्यमिता के राह पर सफलता दिलाएगी!और मैंने उन्हें 2-3 सफलता की कहानियां सुनाई।
मैंने उन्हें वर्धा की एक 14 साल की लड़की जो गांव में केवल गोबर ठेप्ति थी व अनपढ़ थी आज वह आठ कंपनियों की,जिनकी वैल्यू 1000करोड़ रू है, की मालकिन है,मुंबई की इस जीवट महिला की कहानी सुनाई!उसका नाम कल्पना सरोच है, मै स्वदेशी चिट्ठी में उसके बारे में लिख भी चूका हूँ। उसकी गाथा सुनते ही सारा सभागार तालियों से गूंज उठा।लड़कियों के खिले चेहरे देख मैने उनसे दोहरवाया “I will be job provider, not job seeker..” उनकी दमदार आवाज सुनकर मुझे वहां जाना सार्थक महसूस होने लगा!
लड़कियां भी प्रश्नोत्तर सुनकर संतुष्ट,प्रसन्न थी।उससे ज्यादा मैं व वहां के अध्यापक गण थे कि इतने उपयुक्त प्रश्न और इतने उत्साहवर्धक विचार इन लड़कियों के मन में थे। निश्चित है देश पूर्ण रोजगार युक्त होकर नई ऊंचाइयों की तरफ बढ़ेगा।कल की वार्ता से मेरा यह विश्वास और गहरा हो गया।