Image may contain: 1 person, glasses and close-up

अरुण जेटली चले गए! हिंदुत्ववादी भारतीय राजनीति का ऐसा चेहरा,जो सेकुलरों को भी अपना सबसे निकट का मित्र लगता था।वास्तव में कहें तो वाजपेई जी की धारा के थे अरुण जेटली।
1974 में विद्यार्थी परिषद की तरफ से दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष बनने से लेकर आज जाने तक अरुण जेटली जी का 39 वर्ष का राजनीतिक जीवन पूरी तरह निष्कलंक रहा।उनकी विशेषता ही यही थी कि वह विरोधियों से भी बहुत अच्छे व्यक्तिगत संबंध रखते थे। विभिन्न विचारधाराओं के लोगों के साथ तालमेल बैठाने की उनकी कला अद्वितीय थी।वह मोदी जी के अभिन्न मित्र माने जाते थे किंतु मोदी जी के धुर विरोधी और कटु आलोचकों से भी उनके बहुत मीठे संबंध रहे। इसी प्रक्रिया में वह नीतीश कुमार को लालू की पार्टी से तोड़ कर वापस एनडीए में ले आए।

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रहे जेटली भाजपा में नए नए लोगों को लेकर आए जिनमें वर्तमान के निर्मला सीतारमण, राज्यवर्धन राठौर व अनुराग ठाकुर प्रमुख हैं। अकाली पार्टी के साथ भाजपा के गठबंधन के अगुआ भी रहे और नवजोत सिंह सिद्धू को भी लेकर वही आए(बाद में वह स्वार्थवश पार्टी छोड़ गए)
प्रखर वक्ता, भाजपा सरकार की नीतियों जैसे जीएसटी व अन्य को तार्किक पूर्ण तरीके से ना केवल रखना बल्कि बाकी दलों के मुख्यमंत्रियों,नेताओं से बातचीत करके मनवा लेना उनकी बड़ी विशेषता रही। किंतु सबसे बड़ी बात है 40 वर्ष के राजनैतिक जीवन में एक भी दाग नहीं लगा…ना गुटबाजी का, ना भ्रष्टाचार का, ना अन्य कोई लांछन!
2009 में उन्होंने राजनीति में पूरी तरह रहने के लिए वकालत अपने मित्र मनजीत सिंह को सौंप दी 2019 में जब मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनने लगे तो उन्होंने स्वयं होकर पत्र लिख दिया कि मेरा स्वास्थ्य अच्छा नहीं है इसलिए मुझे मंत्री ना बनाया जाए… क्या बात है!
कबीर जी ने अपने एक भजन में कहा है…”ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया..” लगता है अरुण जेटली जी ने इसी को अपना आदर्श माना होगा!
संघ के श्रेष्ठ स्वयंसेवक, विद्यार्थी परिषद के पूर्व कार्यकर्ता, व भारत के पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली जी को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि!शत शत नमन…!