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उस दिन की गोष्ठी के चित्र, अमेरिका की आर्य समाज के अध्यक्ष विश्रुत आर्य व चंडीगढ़ संस्कृत विभाग के प्रयत्नों से यह गोष्ठी हुई। प्रसिद्ध संस्कृत के विद्वान स्व: डॉ सुभाष वेदालंकार की स्मृति में उनके परिवार ने ही यह आयोजन करवाया

3 दिन पूर्व मेरा पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में एक वेद वा संस्कृत पर हुई गोष्ठी में जाना हुआ। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी व एमडीएच के महाशय जी भी उपस्थित थे।
सब योग्य वा बड़े-बड़े विद्वानों ने वेद की मेहता वा संस्कृत की आवश्यकता पर बल दिया। मैंने सुझाव दिया की वेद और संस्कृत को रोजगार से जोड़ना चाहिए।

कुछ दिन पूर्व की बात है। दिल्ली के स्वदेशी कार्यालय में जो मंदिर है उसके पुजारी के पास एक परिवार नई कार लेकर आया। पंडित जी ने जैसी पूजा कराई वह ₹500 देकर चले गए।बाद में मैंने पंडित जी को कहा “यदि तुमने बच्चों को दो फूल दे दिए होते, एक गणेश जी का अच्छा सा चित्र भेंट कर दिया होता और उन्हें इस गाड़ी के लिए कोई शुभकामनाओं का संदेश..(वेद मंत्र) यह बताया होता तो शायद वह तुम्हें 1100 रुपए दे जाते।पंडित जी को भी बात लगी।

देश नहीं दुनिया भर में जहां भी हिंदू समाज के लोग हैं,उनको अच्छे तरीके से शादी पढने,जन्मदिन मनाने, गाड़ी खरीदने या अन्य मंगल प्रसंगों पर अच्छे ढंग से संस्कृत के मंत्र…वेद वाक्य, बोलने वाले नहीं मिलते। यदि इस पर ध्यान दें तो इससे बहुतों को स्व-रोजगार मिलेगा… पूजा पाठ करवाने वाले लोग खुश होंगे और वेद मंत्र वा संस्कृत का प्रचार-प्रसार बढ़ेगा।
केवल सरकार से अनुदानों की मांग करने से काम नहीं चलेगा। बहुत से लोग सहमत हैं।

आप भी है क्या?