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आज बहादुरगढ़ में हरियाणा प्रांत की स्वदेशी जागरण मंच की बहुत अच्छी बैठक हुई। हरियाणा में स्वदेशी आंदोलन एक व्यापक रूप ले इसकी विस्तृत योजना हुई।

आज सवेरे उठते ही,सिर मुंडाते ही ओले की कहावत के अनुसार मोबाइल खोलते ही फेसबुक व्हाट्सएप एसएमएस और फोन इन चारों से जन्मदिन की शुभकामनाओं की बरसात(ओले)पड़ने लगी।
जिन्होंने भी शुभकामनाएं भेजी उन सब का हार्दिक धन्यवाद। बहुतों के फोन या मैसेज के उत्तर नहीं दे पाया..उनसे हाथ जोड़कर क्षमा।
किंतु आज जब बहादुरगढ़ में हरियाणा प्रांत की बैठक करके आ रहे थे तो मैंने अपने सीतेंद्रजी व कुणाल जी से पूछा “यह फेसबुक पर जन्मदिन की शुभकामनाएं..इस उम्र में कितनी उचित हैं?” कुणाल जी बोले “भाई साहब! वह शुभकामनाएं ही दे रहे हैं,कोई पत्थर तो नहीं मार रहे!” आपका क्या जाता है। धन्यवाद कर दीजिए।

हां!यह तो ठीक है किंतु इसका दूसरा पक्ष भी है।छोटे बच्चों का जन्मदिन मनाया जाना तो चलो एक बात है।पर अब इस उम्र में जन्मदिन और फिर जन्मदिन ही नहीं,लोग शादी की वर्षगांठ और जाने क्या-क्या की वर्षगांठ मनाते फोटो भेजते रहते हैं।और फिर थोड़ी थोड़ी देर बाद देखते हैं कि कुछ लाइक आए कि नहीं?
यदि थोड़े आए तो उदासी और अधिक आए तो अहंकार।… फिर दूसरे से तुलना..इर्षा..द्वेश।
वास्तव में यह सारी प्रक्रिया ही बहिर्मुखी है। जबकि हमारी संस्कृति तो अंतर्मुखी की है।
एक बार एक बहिन ने कहा “भाई साहब! मैंने तो अपनी शादी की फोटो डाली थी तब भी मुझे 100 लाइक तक नहीं आए और आपकी चिट्ठी में 300-400 लाइक कैसे आ जाते हैं?”
मैंने कहा मैं तो संगठन की, विचार की बातें लिखता हूं इसलिए आते हैं।” याने यह एक अपने आप में रोग बन गया है।व्हाट्सएप,फेसबुक के लाइक और कमेंट से हम उदास या प्रसन्न होते हैं। ऐसे में क्या करना..? आप भी सोचिए! कोई सुझाव हो तो मुझे भी लिखिए!
जय स्वदेशी जय भारत