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कल कार्यालय में कश्मीरी लाल जी, कमलजीत जी, बलराज जी, विकास जी व रविन्द्र जी के साथ

कल रात कश्मीरी लाल जी व मैं, रात्रि भोजन के बाद कार्यालय की छत पर टहल रहे थे। क्योंकि कल जन्मदिन था, इसलिए अनेक बंधु मिलने के लिए आए थे। जो आए थे उनमें से एक के बारे में एक संस्मरण कश्मीरी लाल जी ने बताया “सतीश जी! यह जो आज पुराने वकील साहब आए थे, वह अलग से लिफाफे में ₹15000 दे गए हैं!”
मैंने पूछा “किस बात के?”

वे कहने लगे “उन्होंने सात आठ वर्ष पूर्व किसी एक स्वयंसेवक से एक मुकदमे के सिलसिले में ₹15000 अपनी फीस के तय किए थे। जिस स्वयंसेवक का मुकदमा लड़ना था, उस स्वयंसेवक को लगा, कि वकील साहब शायद इतने अच्छे से नहीं लड़ पाएंगे। इसलिए उन्होंने दूसरा वकील कर लिया।

जब इन्हें पता चला तो उन्होंने कहा “लेकिन मेरी जो फीस तय है, वह मुझे दे दो। क्योंकि मैं शुरू की सारी प्रक्रिया कर चुका हूं।”
उस स्वयंसेवक परिवार ने दे दिए। और मुकदमा किसी दूसरे वकील से करवा लिया।

लेकिन इन वकील स्वयंसेवक को कहीं न कहीं मन में कचोटता रहा कि यह मुकदमा तो मैंने लड़ा नहीं। लगातार सात आठ वर्ष तक वह मन में यह ग्रंथि पाले रहे कि मैंने कुछ ठीक नहीं किया और अंततः कल उन्होंने निर्णय किया और वह 15000 रुपये यह कहकर दे गए कि उस स्वयंसेवक को लौटा देना। और कहा की “मैंने अपना मन का भार हल्का कर लिया है।”

मैं सोच में था। ना किसी ने कहा, ना कोई झगड़ा हुआ, 7-8 वर्षों में तो वह स्वयंसेवक व उसका परिवार भी भूल गए होंगे। किंतु किसने इनको इस सारे के लिए प्रेरित किया। तो वास्तव में वह था इनका स्वयंसेवकत्व! प्रार्थना में बोलते ही हैं “सुशीलन जगदयेन्नमरम भवेत…”

संघ शाखा व प्रार्थना के संस्कार ही ऐसे होते हैं।

~सतीश कुमार