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रमण महर्षि के आश्रम में जब जब भी रमण बोलते थे—तो उनके सुनने वालों में एक गाय भी नियमित आती थी…

यह वर्षों तक चला। दूसरों को तो खबर हो जाती थी, गाय को तो कोई खबर भी नहीं की जा सकती थी…

दूसरों को पता होता कि आज रमण पांच बजे बोलेंगे। गाय को कैसे खबर होती! गाय को कौन खबर करने वाला था! लेकिन पांच बजे, दूसरे चाहे थोड़ी देर-अबेर पहुंचें, गाय ठीक समय पर उपस्थित हो जाती।

जब गाय मरी, तो रमण ने कहा कि वह मुक्त हो गई। और रमण ने गाय के साथ वही व्यवहार किया, जो उन्होंने सिर्फ एक और व्यक्ति के साथ किया जीवन में और फिर कभी नहीं किया। जब उनकी मां मरी, तो जो व्यवहार उन्होंने किया, वही व्यवहार उन्होंने उस गाय के मरने पर किया। और दोनों की पूरी की पूरी अंत्येष्टि ठीक वैसे ही की, जैसी अपनी मां की कि, वैसी उस गाय की कि।

कोई ने रमण से पूछा कि आप यह क्या कर रहे हैं एक गाय के लिए! उन्होंने कहा, वह तुम्हें गाय दिखाई पड़ती थी। तुम आदमी दिखाई पड़ते हो, इससे ही आदमी नहीं हो जाते। वह गाय दिखाई पड़ती थी, इसलिए सिर्फ गाय ही नहीं थी। वह गायों में बड़ी श्रेष्ठ थी। उसने एक दूसरा आयाम छू लिया था। और वह मुक्त हो गई।

साभार…गीता दर्शन…