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मेरा 6 दिन का दक्षिण का प्रवास चल रहा है। कल मैं मदुरई में था।वहां के कार्यकर्ता पुमारन के घर पर रहना हुआ। वह और उनकी पत्नी हिंदी तो समझने का सवाल ही नहीं अंग्रेजी भी समझते नहीं थे।वह स्वदेशी का सहविभाग संयोजक है।
अब कार्यकर्ता तो फिर थोड़ी बहुत अंग्रेजी के शब्द या संगठन का होने के कारण से बात कर रहा था। किंतु कार्यकर्ता जब कुछ सामान खरीदने बाहर गया तो 10 मिनट बहनजी से बात हुई।अब वह ना हिंदी समझती ना अंग्रेजी। मैंने कहा फीकी चाय बना दो,तो वह मीठी कॉफी बनाने लग गई।मैने कहा बच्चे कौन कौन हैं तो वह कमरे बताने लग गई।
खैर! 10 मिनट की बातचीत में ना मेरा एक शब्द उनको समझ में आया ना उनका मेरे को।किंतु लग ऐसे ही रहा था जैसे मैं सोनीपत की अपनी बड़ी बहनजी के साथ बातचीत कर रहा हूं।
हम दोनों हंसे भी जा रहे थे, क्योंकि समझ में कुछ आ नहीं रहा था।
जब हम लोग भोजन पर बैठे तो उस कार्यकर्ता की पत्नी उतने ही आग्रह से इडली थाली में डाल रही थी जितने आग्रह से हरियाणा- पंजाब के अपने पुराने कार्यकर्ता के परिवार में बहनें रोटी डालती हैं।
मैं सोच में था कि यह जोड़ने वाला तत्व कौन सा है,..वह है~हिंदुत्व, स्वदेशी व संगठन
हां! वहां पर यह तीनों ही तत्व, उत्तर भारत की अपेक्षा अधिक गहरे हैं।यह भी स्पष्ट दिखाई देता है।