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दादा-दादी,गौरव,उनकी पत्नी व बिटिया

कल मैं फरीदाबाद गया। अपनी संतोष बहनजी के घर! उनकी पोती मेरे से खेलने लगी! खैर जब मैं घर से निकला तो गौरव(भान्जा) से मैंने पूछा “बिटिया कितने वर्ष की है?”
तो उसने कहा “5 वर्ष की!”
मैंने कहा “क्या बात? अभी तक उसका कोई बहन भाई नहीं है?”
तो गौरव मेरी तरफ देखकर आश्चर्यजनक रूप से मुस्कुराने लगा, शायद पूछ रहा था “सतीश जी!और करना चाहिए क्या?”

ऐसे ही एक मेरी रिश्ते में भतीजी लगती है उसकी भी एक बिटिया है कहने पर भी वह दूसरा बच्चा करने को तैयार नहीं है। आजकल यह रिवाज हो गया है। पहले कहते थे “दो या तीन बच्चे घर में रहते अच्छे” फिर ‘दो के बाद बस” और अब तो एक ही।
कुछ लोगों का मत है कि जनसंख्या नियंत्रण होना चाहिए।नहीं तो देश के संसाधनों का क्या होगा?
एक दूसरा दृष्टिकोण भी है कि मुस्लिम आबादी का वृद्धि प्रतिशत हिंदू समाज की आबादी से अधिक है एक सामान जनसंख्या वृद्धि नीति ठीक रह सकती है।

किंतु दो बच्चे यह तो होने ही चाहिए।
आज सारा यूरोप, रूस,ऑस्ट्रेलिया यहां तक कि अमेरिका और चीन भी बूढ़े होते जा रहे हैं।हमारे भारत की जनसंख्या वृद्धि अब अधिक नहीं है और दो बच्चे सामान्य घर में रहे तो यह ठीक बनी रहेगी। एक होने से हम एक देश के नाते से जल्दी बूढ़े हो जाएंगे।

एक बार अपने वरिष्ठ प्रचारक कृष्णप्पा जी ने ऐसे ही जनसंख्या के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसी कार्यकर्ता से पूछा “तुम कितने बहन भाई हो?”
तो बताया “4!”
“तो तुम अपनी मां पर भार हो या उनकी संपत्ति हो?” तो कार्यकर्ता ने कहा “संपत्ति”
तो कृष्णप्पा जी ने कहा “भारत माता के लिए भी उसके बच्चे संपत्ति हैं,बोझ नहीं।”
बेतहाशा वृद्धि तो नहीं होनी चाहिए। किंतु 2 से भी कम बच्चे होना,..ठीक है क्या?