Padmaavat movie review: Bigotry, biases ki beauteous raas-leela
कल स्वदेशी कार्यालय पर केशव पुरम विभाग दिल्ली के कार्यकर्ता अरुण जी आये! औरबताने लगे “मैं कल पद्मावत फिल्म देख कर आया हूं” तो मेरी जिज्ञासा हुई और मैंने उनसे पूछा “इस फिल्म में वास्तविक नायक किस को दर्शाया गया है और खलनायक किसको?” तो वह बोला “Nayak तो किसी को नहीं दिखाया पर Khalnayak जरूर एक राजगुरु को दिखाया है जो कि एक ब्रह्मचारी है” मैंने कहा “वह कैसे? तो उसने कहा कि “उसने पति पत्नी रानी पद्मावती और रत्ना सिंह को बिस्तर पर देखा (चोरी से)इस पर राजा ने चाकू फेंक कर मारा और बाद में पता चल गया तो उसे देशनिकाला दे दिया और वह ख़िलजी से जा मिला। बाद में जब रानी रतनसिंह को ख़िलजी से छुड़वाना चाहती थी तो पद्मावत ने खिलजी से मिलने के लिए पहली शर्त रखी कि राजगुरु का सिर चाहिए और खिलजी ने सिर काट कर दे दिया” सारी कहानी सुनने के पश्चात मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वास्तव में इतिहास को कितना तोड़ मरोड़ कर दिखाया गया इस पद्मावत फिल्म में!हमारे हजारों साल के इतिहास में अपवाद स्वरुप भी यह उदाहरण नहीं है कि राजगुरु की नजर अपने राजा की पत्नी पर पड़ी हो!राज्य गुरु के लिए राजा और उसकी पत्नी यह संतान समान होती हैं!वह धर्म का प्रतीक होता है!वह राजा व रानी को हमेशा राह दिखाता है उसको खलनायक बनाकर क्या दिखाना चाहते हो?” वैसे भी फ़िल्म जगत में ब्राह्मण को खलनायक व् पादरी,मौलवी को सेवा भावी दिखाने का पुराना रोग है… जिसे अब बदलना होगा।
ऐसे ही दूसरा विषय कि रानी पद्मावती ही रतन सिंह को समझाती है कि खिलजी को, मुझे एक बार देख लेने दो!कितनी बेहूदा बात है?यह क्या एक सामान्य व्यक्ति भी जो मोहल्ले में रहता है उसको गली का गुंडा कहे कि तुम मेरे को एक बार अपनी पत्नी दिखाओ नहीं तो मैं तुम्हारी पिटाई करूंगा,तो वह तैयार होगा क्या?अगर एक सामान्य व्यक्ति अपनी पत्नी को नहीं किसी गुंडे को दिखाता, तो रानी पद्मावती जो शौर्य व स्वाभिमान हेतु जोहर तक करने को तैयार हो जाती है,वह कैसे रतन सिंह को खिलजी को दिखाने की बात कर सकती है?वास्तव में ही यह फिल्म हमारे समाज-इतिहास और हिंदुत्व को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का एक भद्दा वामपंथी दृष्टिकोण का प्रयास है!हैरानी तो इस बात की है कि वेद प्रकाश वैदिक और अन्य भारतीय बुद्धिजीवी कैसे इस फिल्म के बारे में समर्थन करने में लगे हुए हैं?
1960 के दशक में एक बार पूजनीय गुरु जी चित्तौड़ गए थे!तो गाइड ने जब यह विषय छेड़ दिया कि पद्मावती को खिलजी ने शीशे में देखा तो गुरुजी गुस्से में बोले “चुप रहो! अपनी मूंछ के बाल पर भी अगर विषय आए तो जो युद्ध में उतरते हैं,ऐसे राजपूत लोग अपनी पत्नी को और दिखाने के लिए तैयार हो सकते हैं?ऐसे विकृत बातें क्यों तुम बताते हो” गाइड को भी समझ में आ गई!
गाइड को तो समझ में तब आ गई लेकिन हमारे देश के बुद्धिजीवियों और फिल्मकारों को आज तक समझ में नहीं आई….निष्कर्ष हम स्वयं निकाले…