कल मुझे प्रोफेसर वेदप्रकाश लोहाच जी हरियाणा के पिछड़े, ग्रामीण इलाके (भिवानी जिले के बहल ब्लॉक) में ले गए। वहां दो भाई डायरी उद्योग चल रहे हैं। जब वहां पहुंचा तो मेरी कल्पना से परे, बड़ा प्रकल्प था।

मैंने पूछा “आप लोगों ने कब शुरू किया और पृष्ठभूमि क्या है?” तो अजीत कुमार ने बताया “2004 में 12वीं करके,घर के हालत अच्छी ना होते, थोड़ा दूध इकट्ठा करके बेचने का काम शुरू किया। फिर 2007 में जब 2500 लिटर तक दूध इकट्ठा होने लग गया तो हम उसे मंडी गोविंदगढ़ पंजाब के चाणक्य डेयरी प्लांट में देने लगे। मेरी छोटी उम्र,ग्रामीण पृष्ठभूमि अनपढ़ होते हुए भी मेरे साहस,व बड़ा बनने की इच्छा देख, प्लांट के मालिक ने हमें प्रोत्साहित किया और हमने एक छोटा प्लांट लगा लिया।”

मैंने पूछा “शुरुआती पूंजी कहां से आई और प्लांट के टेक्नोलॉजी आदि कहां से ली?”
वे बोले “हमारा संयुक्त परिवार है 3-4साल काम करते हुए 6-7 लाख हमने बना लिए थे। कुछ लोगों ने हमारी इमानदारी देखकर उधार दे दिया। जमीन थोड़ी सस्ती मिल गई। बाकी हमारी हिम्मत,लगन वा दिन-रात की मेहनत ने काम किया।”
मैंने पूछा “कभी कठिनाई नहीं आई!” तो वह बोले “दो बार हम बुरी तरह पस्त हुए। 2011 में जब हमारा 40000 लीटर दूध इकट्ठा हो रहा था, तब एक बार भाव बहुत गिर गए। सोचा क्या करें?

तो हमने कठिनाई को अवसर में बदला। दूध नहीं बिक रहा तो हमने पनीर,घी व रसगुल्ले बनाने शुरू किए। उससे हम मंदी से बाहर निकल आए,किसानों का विश्वास भी बना रहा,क्योंकि हम उनसे दूध लेते ही रहे। दूसरी बार जब भाव बहुत चड़ गए, हमें शायद ₹100000 प्रति दिन भी बच जाता यदि गुरुग्राम में ओपन मार्केट में बेचते परंतु हम दोनों भाइयों ने छोटी नहीं लंबी दूरी की सोची।तात्कालिक लाभ की बजाय विश्वास को प्राथमिकता दी और मंडी गोबिंदगढ़ के प्लांट का साथ नहीं छोड़ा।

हमारा निर्णय ठीक सिद्ध हुआ जब 5 महीने बाद ही दूध के दाम में मंदी आई।तब मंडी गोविंदगढ़ वालों ने वही रेट रखा, हम दूसरी बार तबाह होने से बच गए।”

“अपने इस प्लांट से कुल कितने लोग रोजगार पाते हैं?” मैंने पूछा।

वह बोले “हम 10,000 किसानों को जोड़े हुए हैं उनको हम 55-60 रुपए लीटर दूध के देकर, किसानों की आय वृद्धि करने में सीधे सहायक हो रहे हैं। और 130 हमारे प्लांट के कर्मचारी हैं। फिर हमने लॉकडाउन के 2 महीने में किसी एक को भी निकाला नहीं, बैठाकर खिलाया और पूरी तनख्वाह दी,एक रुपैया भी काटा नहीं।

अब यह हमारे परिवार के ही सदस्य हैं। हमारा 40 करोड़ का टर्नओवर है आगे 60 करोड़ तक हो जाएगा।” मैं अचरज में था कि शून्य से शुरू कर 40 करोड़ तक का टर्नओवर करने वाली कंपनी तो आईआईएम अहमदाबाद वाले भी नहीं बना पाते और यहां यह दो 12वीं पढ़े युवाओं ने कर दिखाया है

~सतीश कुमार