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देशभर में चल रहे स्वदेशी सप्ताह के अंतर्गत भिलाई की टोली के साथ। इधर अमृतसर की टोली स्वदेशी प्रचार करते हुए

कल जब मैं भोपाल से दिल्ली आया अपने डिब्बे से निकलकर में तेजी से स्टेशन की सीढ़ियों की तरफ बढ़ रहा था कि तभी मेरी नजर A-1डिब्बे के सामने खड़ी एक महिला और उससे बात करते कुली पर पड़ी। कुली कह रहा था “मैडम! सवेरे से मेरे को काम नहीं मिला। वैसे तो ₹150 का रेट है पर आप सौ ही दे दीजिए। महिला बोली”अरे कहां! ₹50 ही दूंगी! खैर कुली ₹80 पर आया तो बड़ी मुश्किल से उस महिला ने पहले 60 और फिर ₹70 में राजी हुई।
मैं सोच में पड़ गया कि A-1 डिब्बे से निकली महिला उसको ₹100 भी दे देती तो महिला को तो कोई फर्क पड़ना नहीं था हां वह कुली जरूर दिन भर खुश रहता।

पूजनीय गुरूजी (संघ के दूसरे सरसंघचालक) कभी रिक्शा पर नहीं बैठते थे।तब एक कार्यकर्ता ने उनसे पूछा “गुरु जी हम तो आपका अनुसरण करते हैं। क्या हमें भी नहीं बैठना चाहिए?”
तो गुरु जी ने कहा “नहीं! तुम गृहस्थी हो। तुम अगर नहीं बैठोगे तो और दिक्कत हो जाएगी। हां! एक बात ध्यान करनी चाहिए कि ₹2-3 के लिए रिक्शा वाले से झगड़ा नहीं करना चाहिए। यदि ₹2 अधिक ले भी लेगा तो किसी गरीब का परिवार ही पलेगा।”
तब से मुझे हमेशा यह प्रसंग याद रहता है।

इसी समय जिस ऑटो से मैं कार्यालय आया, उसका बिल बना 103 रुपए। मैंने उसको ₹110 दे दिए जब वह ₹7 लौटाने लगा तो मैंने मना करते कहा “भाई! बेटे के लिए टॉफी ले जाना।”
वह मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया तो मुझे लगा कि वह हजारों रुपए की मुस्कुराहट थी,
जो मुझे केवल सात रुपए में मिली…