आज JC बोस यूनिवर्सटी फ़रीदाबाद में entrepreneurship बोलते हुए मैं स्वयं व राहुल गांधी
आगामी दिनों में लोक सभा के चुनाव आने वाले हैं।ऐसे में राजनेताओं का शालीनता का स्तर बना रहे,यह सभी को अपेक्षा है।
कल जो दो घटनाएँ हुई।उस से विचलित होकर आज की स्वदेशी चिट्ठी लिखने की सोची।
कल राहुल गांधी, बीमारी से जूझ रहे,गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पार्रिकर से मिले।जैसे ही यह ख़बर आयी कि राहुल मिलने जाने वाले हैं मैं समझ गया था कि वह किस तिकड़म में हैं।हुआ भी वैसा ही।उन्होंने केवल 5 मिनट के लिए मिलना किया और बाहर आकर सफ़ेद झूठ बोल दिया कि पारीकर ने कुछ राफेल के बारे में कहा है। जबकि कुछ ही घंटों बाद मनोहर पार्रिकर ने मीडिया में पत्र भेज दिया कि इस विषय का 5 मिन्ट की औपचारिक मुलाकात में जिक्र तक नहीं हुआ।
कुछ दिन पूर्व राहुल द्वारा संसद के अंदर आंखें मारते हुए,व मोदी को जफ्फ़ी भरते हुए के भी फ़ोटो सारे देश और दुनिया में चर्चित हुए थे।चोर डाकू जैसे शब्दों का प्रयोग नेताओं के निम्नतम स्तर को दर्शाता है।विदेश में जाकर राहुल द्वारा मोदी की आलोचना करते करते देश की,सैन्य बलों की आलोचना कर बैठना क्या उचित है? नहीं!
कल दूसरी ख़बर आयी कि जब अमित शाह बंगाल में मिदनापुर में रैली करने गए तो वहाँ खड़ी बसों पर तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ की जब गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्य मंत्री ममता बैनर्जी से पर इस विषय में फोन किया तो वे ग़ुस्से में अनाप शनाप बोलने लगीं।
केवल कांग्रेस के नेता ही बड़बोले हों ऐसा नहीं,यदा कदा भाजपा व अन्य दलों के छुटभैये नेताओं के भी हल्के बयान आ जाते हैं।
एक पुरानी घटना मुझे याद आई जब जवाहर-लाल नेहरु से मिलने के लिए अमेरिका के एक विशेष राजनायिक आए तो अटल बिहारी वाजपेयी का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा था “ He is a Prime minister materiel”
इसी तरह जब बांग्लादेश की लड़ाई जीती गई तो अटलजी ने उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भूरी भूरी प्रशंसा करने में संकोच नहीं किया।जो कि आज के वातावरण में दुर्लभ बात है।
लोकतंत्र में विचारों का विरोध करना चाहिए।किंतु इतने बड़े राजनेताओं को न्यूनतम मानदंड अवश्य रखने चाहिएं। ताकि देश की जनता में ठीक संदेश जाए और जनता ने भी अपने राजनेताओं पर शालीनता बनाए रखने का दबाव डालते रहना चाहिए।और नेताओं को तिकड़में करते या गल्तबयानी करते हुए सदा ध्यान रखना चाहिए “ये पब्लिक है,सब जानती है!..”
आपका~सतीश कुमार ‘स्वदेशी चिट्ठी’