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जब कार्यालय में वापस आया तो मेरे कटे हुए बालों को देखते हुए कार्यालय का ही हमारा बंधु मनोज कुमार

आज मैं दिल्ली कार्यालय के पीछे की मार्केट में अपने बाल कटवाने के लिए गया।हमारा नाई निश्चित है। परंतु इस बार वह स्वयं कहीं गया था तो उसका भतीजा मेरे बाल काटने लगा।
मैंने उससे पूछा “क्या नाम है?”
वह बोला “बलबीर सिंह।”

“यह तुम्हारे चाचा हैं, इनके साथ कब से हो?”
उसने कहा “जन्म से ही!”
और उसने मुझे आश्चर्य से देखा! मैं थोड़ा झेंपा। और मैंने उससे कहा “मेरा मतलब है यह नाई के काम में कब से हो?”
तो उसने बताया “हम हरियाणा के झज्जर जिले के रहने वाले हैं। मैं 13-14 साल का था जब अपने पिता के साथ यह काम करने लग गया। 2 साल तक मैंने गांव में ही काम सीखा। फिर क्योंकि चाचा यहां दिल्ली आ गए थे, तो उन्होंने मुझे कहा तू मेरे साथ चल और हमारे परिवार में तो चाचा, पिता, ताया एक जैसा ही मानते हैं।
तो मैं 16 साल का था जब यहां आ गया। अब तो मैं काम में परफेक्ट हो गया हूं।” (मैं हैरान था कि वह है तो केवल 10 पास पर बीच-बीच में अंग्रेजी के शब्द बोलता है शायद दिल्ली का असर होगा।)

मैंने कहा “कितना कमा लेते हो?” अब वह थोड़ा संकोच में आकर इधर उधर की बात करने लगा। लेकिन मैंने बातचीत में से अंदाजा लगा लिया कि वह 20 से ₹22000 तक महीने के कमा लेता है।
जब पैसे देने लगा तो चाचा भी आ गया उसने बताया “हां! भाई साहब यह बड़ी अच्छी कमाई कर रहा है। और मेरी दिक्कत यह है कि मेरा लड़का बीकॉम कर नौकरी की जिद मारने लगा। अभी यहीं दिल्ली में ही एक जगह नौकरी करता है पर ₹18000 ही कमा पाता है। यह मेरा भतीजा कमाई भी अच्छी करता है और मेरे को इसके कारण से सुविधा भी बहुत है। जब भी गांव में कोई काम होता है तो हमारे में से एक चला जाता है। यहां हमारा काम (कमाई) ठीक चलती रहती है।”

मैं सोच में था कि हमारे यहां परिवारों से ही सीखे हुनर से पीढ़ी दर पीढ़ी रोजगार मिलता है, अभी भी। और पारिवारिक विश्वास के कारण से सुखी जीवन भी चलता है। धन्य है हमारी परिवार परंपरा…