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जम्मू कश्मीर में कश्मीरी लाल जी के प्रवास की खबर व सीएए के समर्थन में रैली के दृश्य

कल रात मैंने जब टेलीविजन खोला तो सीएए पर बहस जारी थी। चैनल बदले तो भी शहीन बाग और वही सब चल रहा था… दूसरा कार्यकर्ता वहां से उठ गया व बड़बड़ाया “क्या, बस यह मुद्दा पल्ले ही पड़ गया है?” और भी एक-दो स्थानों पर कार्यकर्ताओं ने कहा “इस झंझट से किसी तरह निकलना चाहिए।”

मैंने कहा “घबराएं नहीं! जो आज हो रहा है,क्या पहले कभी हमारे को, या हमारी विचारधारा को लताड़ा नहीं गया? हम तो इसके आदी हैं! बल्कि यह पहली बार हो रहा है कि मुद्दा सांप्रदायिकता या हम सांप्रदायिक हैं, यह नहीं, बल्कि हम हिंदूवादी हैं..हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं, यह हो रहा है।” इस बहस में विजयी होकर निकलना ही रास्ता है, बचना,अकना-थकना नहीं।”

कल ही एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक प्रसंग सुनाया “बंगाल में एक गौरीशंकर थे। उन्होंने देवी की साधना की और वर प्राप्त कर लिया कि वह बहस में सामने वाले को हरा देंगे। देवी ने कहा कि बस, बहस शुरू होने से पहले तुम पटों पर तीन बार हाथ मारके हा हा रे रे रा यह बोल देना। गौरीशंकर ने बहस में बहुतों को हरा दिया।

उसे पता चला कि रामकृष्ण परमहंस बड़े विद्वान हैं। वह उनके पास पहुंचा और बहस को कहा। पहले तो परमहंस ने मना किया किंतु उसके आग्रह पर शुरू किया। जैसे ही गौरीशंकर ने हा हा री री रे रे बोला और पट पर हाथ मारा तो रामकृष्ण ने भी बजाय किसी तार्किक विषय के, यही शुरू कर दिया, थोड़े ऊंचे स्वर में। गौरीशंकर ने दोबारा ऊंची आवाज में किया तो परमहंस ने और ऊंची आवाज में वही प्रक्रिया कर दी।।

चार पांच बार ऐसा होने पर गौरी शंकर की आवाज धीमी रह गई और वह पहली बार बहस हार गया। यानी बस हमें यही करना है, अपनी आवाज को हर प्लेटफार्म पर, जरा ऊंचे से और आक्रामक रूप से बोलना है…अंततः अमृत निकलेगा ही अपनी विजय सुनिश्चित है।
~सतीशकुमार