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कल मेरा जींद (हरियाणा) के रणवीर विश्वविद्यालय में जाना हुआ। स्वदेशी-स्वावलंबन व स्वरोजगार पर बोलते हुए मैंने उन्हें नागपुर के वर्धा की एक अति गरीब परिवार की लड़की कल्पना सरोज के बारे में बताया।
“वह केवल आठवीं तक ही पढ़ी थी कि उसकी शादी कर दी गई,केवल 15 साल की उम्र में। लड़का मुंबई की धारावी बस्ती में रहता था। किंतु शादी के बाद ठीक नहीं चला और परिवार ने मारपीट कर घर से निकाल दिया।

पिता ने कहा की जाना तो वहीं पड़ेगा और इस बात से डर कर उसने आत्महत्या करने की कोशिश की, किंतु जैसे तैसे बच गई।
तब बुआ के प्रेरणा देने पर इसने निश्चय किया कि मैं कुछ कर दिखाऊं और अपने बलबूते पर कमाई भी करुगीं।
और वापिस मुंबई में अपनी एक रिश्तेदार मौसी के घर जाकर इसने रहना व वहां पर सिलाई करके कुछ पैसा कमाना शुरू किया।

इसके ध्यान में आया कि दुकान वाले तो ₹200 प्रति सूट सिलने का लेते हैं लेकिन इन्हें केवल 40 ही देते हैं तो इसने हिम्मत करके एक छोटा खोखा किराए पर लिया व अपना बुटीक(दर्जी की दुकान) खोल लिया धीरे-धीरे काम चल निकला। कमाई अच्छी हो गई।

कुछ समय बाद एक रेस्टोरेंट के मालिक दो भाइयों में झगड़ा हो गया। रेस्टोरेंट्स बंद होने के कगार पर था तो वहां के कर्मचारी कल्पना सरोज के पास आए कि यदि किसी तरीके से रेस्टोरेंट चलता रहे तो उनका रोजगार बना रहेगा। तब इसने दोनों भाइयों से बातचीत करके वह रस्टोरेंट लीज़ पर ले लिया और कर्मचारियों को कहा अच्छी मेहनत से चलाओ ताकि आप सबको और मुझे फायदा हो और वही हुआ भी।

फिर कुछ वर्षों बाद जब उसका काम काफी अच्छा हो गया था,तब एक बंद पड़ी फैक्ट्री जिसका कोर्ट में मामला था, एक सरकारी कानून का लाभ उठाकर इसने उस फैक्ट्री का भी मालिकाना हक ले लिया। और कहा कि इसका उधार(लोन) मैं चुका दूंगी और वैसा किया भी।

आज इस महिला की कंपनी ‘कमानी ट्यूब्स’ का 700 करोड़ रुपए का टर्नओवर है। कोई 200 कर्मचारी इसकी कंपनी में काम करते हैं। तत्कालीन राष्ट्रपति ने इसे पुरस्कार दिया।
‘हिम्मत करे इंसान, तो क्या कर नहीं सकता’
~सतीशकुमार