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वारंगल के स्वदेशी स्टोर में।
आज तेलंगाना के वारंगल के पास तोरोर में जिला बैठक थी। बैठक संपन्न करने के पश्चात जिला संयोजक श्रीनिवास जी अपने स्वदेशी स्टोर में ले गए। मैं सामान्य रूप से सारा स्टोर देख रहा था। तभी मेरी नजर एक जगह रुक गई।
मैंने पूछा, “यह क्या चीज है?”
तो उनका बेटा लक्ष्मण अंग्रेजी में बोला, “काऊ डंग केक याने गाय के गोबर का पेड़ा।”
मैंने कहा, “यहां कैसे?”
तो वह बोला, “यह 40 रु. का एक पैकेट बिकता है एक पैकेट में 10 केक है। मुझे आश्चर्य हुआ।
मैंने पूछा, “किस काम आता है?”
तो वह बोला, “पूजा के काम आता है और बाद में इसको जलाकर इसका मंजन भी करते हैं और भी अनेक काम आता है। प्रतिदिन छह सात पैकेट तो जरूर बिक जाते हैं।”
मैंने साथ खड़े लिंगामूर्ति जी से पूछा, “एक दिन के गोबर से कितने पैकेट बन जाते होंगे?”
तो वह बोले “5! याने रु.200 का गोबर रोज बिक जाता है। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ व सोचा गाय तो जीते जी से लेकर मृत्यु के बाद तक देती ही देती है तभी हम उसे माँ मानते हैं।