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मोटरसाइकिल चालक प्रवीण के साथ, सेल्फी लेकर, मैंने उसको समर्थन दिया

मुझे कल दिल्ली में चौपाल कार्यालय से वापिस आर.के पुरम कार्यालय आना था। विजित ने मुझे कहा “सर! बाइक पर चले जाएंगे?”
मैंने कहा “कोई दिक्कत नहीं! पर बाइक किसकी?” तो उसने बोला “ओला या उबर की!” सुना तो था,पर सवारी करने का यह पहला अवसर था। 8 मिनट बाद मोटरसाइकिल आ गया। और 25 मिनट में मैं स्वदेशी कार्यालय पहुंच गया।

मैंने मोटरसाइकिल चलाने वाले से पूछा “कितना कमाते हो, और भी कुछ काम करते हो क्या, भाई?”
उसने बताया “मैं लाइसेंस व पासपोर्ट बनाने का काम करता था। कमाई केवल ₹12-13000 ही महीने होती थी। परेशान था,घर का गुजारा कैसे चले? दो बच्चे भी हैं। तभी मुझे मेरे दोस्त ने यह विचार सुझाया। मेरे पास मोटरसाइकिल तो थी ही, मैंने उबर में रजिस्टर करा ली, ऑनलाइन, कहीं जाना नहीं पड़ा। और अब मैं 2:00 बजे तक पासपोर्ट बनवाता हूं। सायं 3 से 8 बजे तक इस मोटरसाइकिल से ही महीने भर में 13-14 हजार कमा लेता हूं। कुछ अलग से नहीं लगाया। माता-पिता के साथ रहने से मकान का किराया नहीं, घर अच्छा चल रहा है।”

मैंने उसे शाबाशी दी व आदत अनुसार ₹5 अधिक भी। ऑटो की अपेक्षा मेरे भी ₹50 बच गए थे।
जाते-जाते मैंने कहा “मां- बाप की सेवा जरूर करना। उनका आशीर्वाद इससे अधिक काम करता है। वह मेरी तरफ सुखद आश्चर्य से देख रहा था और मैं खुश था एक स्वदेशी सोच का स्वरोजगारी मिला।

~सतीश कुमार