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कल जब मुझे दिल्ली कार्यालय से चौपाल कार्यालय जाना था तो ओला ऑटो वाला बुलाया। स्वाभाविक रूप से मैंने बातचीत शुरू की “क्या नाम है भाई? बड़ा साफ सुथरा ऑटो रखा है!”
तो उसने कहा “साहब! मेरा नाम मनोज है। मैं ऑटो और अपना शरीर और कपड़े यह तीनों साफ सुथरे रखता हूं। एक तो इससे ऑटो की लाइफ लंबी रहती है और मेरे तन मन को प्रसन्नता भी रहती है। फिर मैं ऑटो का मालिक हूं और ठीक-ठाक बंदा हूं, यह देख पुलिस वाले भी, तंग कम करते हैं। मैं हैरान था कि यह सामान्य ऑटो वाला कैसी अच्छी सीख दे रहा है।

फिर मैंने पूछा “घर में कौन-कौन है और कितना कमाते हो?”
मनोज बोला “घर में माता-पिता के अलावा, चार बहनें हैं। दो की शादी कर चुका हूं तीसरी की नवंबर में करनी है। बाद में अपनी सोच लूंगा।
मैंने पूछा “कितनी उम्र हो गई है?”
वो बोला “वैसे 30 साल हो गई है। पर पहले बहनें, चाहे छोटी हों,उन्हीं की करनी है। मैंने इसलिए नहीं की, कि पहले ठीक से कमाई करके, बहनों का घर ठीक से ढूंढ लूं।एक बार वे अपने घरों में सुख पूर्वक चली जाएं, फिर मैं तो करा ही लूंगा।”

मैं सोच में पड़ गया की सामान्य भारतीय की सोच कैसी है? की बहने अपने घर में सुखी हो जाएं उसके लिए स्वयं की शादी चार पांच साल देरी भी हुई तो चलेगा… यही है हमारी परिवार व्यवस्था, जिस पर हम भारतीयों को गर्व है। पश्चिम में तो कोई ऐसे सोच भी नहीं सकता।
मैंने जाते हुए उसे शाबाशी भी दी। और किराए के ₹124 के 130 दिए।
स्वभाविक है सेल्फी तो ऐसे ऑटो वाले के साथ बनती ही है

~सतीश कुमार