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अमृतसर महानगर संयोजक अरविंद जी जब मुझे जनरल डिब्बे में बैठाने के लिए आए

कल मुझे अमृतसर से दिल्ली आना था। संयोग से टिकट का आरक्षण निश्चित नहीं हो पाया। अरविंद जी ने सुझाव दिया कि वोल्वो से जाया जाए। किंतु फिर मन बना कि आज बिना आरक्षण के जनरल डिब्बे में जाकर देखते हैं। और इस बार कई महीनों बाद जनरल डिब्बे में जाने का अवसर आया।

वहां भीड़ बहुत ज्यादा थी,गर्मी भी काफी थी।पैर रखने को जगह नहीं।सभी पसीनो-पसीन थे।तब मुझे एहसास हुआ कि जो लोग दिल्ली से अमृतसर तक इतनी गर्मी में खड़े-खड़े जा रहे हैं,उसका प्रमुख कारण है कि वे कम कम खर्चे से ही जा सकते हैं।
डिब्बे में खड़ी माताओं और बुजुर्गों की हालत देखकर मैं सोच रहा था कि गरीबी कितनी कष्टदायक है?
ऐसे ही कुछ दिन पूर्व कमल जी के साथ दिल्ली के झुग्गी झोपड़ी इलाकों में गया। इतनी गर्मी में, उमस में 6×8 के एक कमरे में पांच-पांच लोगों का परिवार कैसे रहता है? नाले के किनारे,मच्छर, बीमारियां, गर्मी…बरसात!!
उफ़! गरीबी वास्तव में अभिशाप है। ऐसे स्थानों पर जाकर प्रत्यक्ष अनुभव करके ही ध्यान में आता है।राजनीतिक पार्टियां,गरीबी हटाओ का नारा बहुत लगाती हैं पर संदेह है कि किसी नेता ने वास्तव में कभी गरीबों के कष्ट को अनुभव किया हो?
आजादी के 72 वर्ष बाद भी,इस देश की 28 करोड़ जनता गरीबी रेखा से भी नीचे जीवन यापन कर रही है। इसका समाधान क्या हो? कैसे हमारी गरीबी रेखा 0% पर आए?
केवल एक ही समाधान है कि हर एक परिवार में एक व्यक्ति ठीक से रोजगार युक्त हो जाए। स्वदेशी के कार्यकर्ता ही नहीं संपूर्ण समाज व सरकार को विचार करना होगा कि गरीबी मुक्त-समृद्धि युक्त और रोजगार युक्त भारत कैसे बने?
हां! बनेगा जरूर! भारत की नियति ही यही है।
हम गीत गाते ही हैं,…
“जो अनपढ़ हैं, उन्हें पढ़ाएं, जो चुप हैं उनको वाणी दें पिछड़ गए जो उन्हें बढ़ाएं, प्यासी धरती को पानी दें, हम मेहनत के दीप जलाकर, नया उजाला करना सीखे देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे।”