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कल कोटा,राजस्थान में परिवार मिलन के बड़े कार्यक्रम में कश्मीरी लाल जी। तथा पति पत्नी दिगंबर-अनीता नासवा जी

यह बात 2001 की है।जब मैं जम्मू में प्रचारक था। उस समय पर आतंकवाद चरम पर था। आतंक पीड़ित परिवारों की बच्चियों का एक देखभाल केंद्र अपनी सेविका समिति की बहनें चलाने लगीं।
वहां की प्रचारिका पंकजा जी ने यह जिम्मेदारी ली। किंतु एक बड़ा विषय खड़ा हुआ कि उनके लिए धन की आपूर्ति कहां से हो?
तब इंद्रेश जी, राकेश जी व मैं विचार करने लगे।
तभी अचानक उस समय दुबई में रह रहे,मूलतः फरीदाबाद के अपने दिगंबर जी का वहां आना हुआ।मैंने उनसे कहा “यह आतंकवाद पीड़ित बच्चियों के 15 का छात्रावास चलाना है,इसमें आप कुछ सहयोग कर सकते हैं क्या?”
वह अगले ही महीने अपनी पत्नी सहित वहां आए और उन्होंने कहा “इन बच्चियों के लिए जो हमसे बन सकता होगा हम करेंगे।”
और तब से लेकर आज तक 17 वर्ष से अधिक हो गए वह लगातार उस प्रकल्प में वहां के अपने बंधुओं से कुछ एकत्र करके उस प्रकल्प का पूरा आर्थिक सहयोग कर रहे हैं।
जब मैंने उनसे चर्चा की तो उनकी पत्नी अनिता बहन जी जिन्हें मैं स्नेह से स्वदेशी प्रचारक की विदेशी बहन कहता हूं,कहने लगी “हमारी अपनी दो बेटियां हैं हम तो अब यह मानेंगे कि अब हमारी 17 बेटियां हैं।”
और केवल पैसा ही नहीं वह लगातार फोन से या बीच-बीच में जम्मू आकर उन बच्चियों से मिलना जुलना उनकी सब प्रकार के चिंता ये पति-पत्नी करते रहते हैं।
मैंने जब एक बार दिगंबर जी को कहा कि क्या इसके बारे में मैं पत्रिका में लिख दूं तो उन्होंने कहा “अपने बच्चों के पालन करने के लिए किसी प्रचार की आवश्यकता ही कहां है?”
यही नहीं मैंने देखा है कि वे आजकल भले मलेशिया में रहते हों,किंतु सब प्रकार के संगठन के कार्यों में सहयोग करने को तत्पर रहते हैं।पर उन्हें न प्रचार चाहिए न किसी प्रकार की अन्य अपेक्षा है।
यही है निष्काम सेवा याने स्वयंसेवकत्व।
यही है सच्ची देशभक्ति जो कि क्रियात्मक रूप से प्रकट हो रही है।