*कल लुधियाना के पुराने व बड़े आर्य कालेज का हाल खचाखच भरा था!कालेज के अध्यापक थोड़ा चिन्तित थे कि स्वदेशी जैसे विषय पर कैसे लड़के जिनमें बडी सख्यां मे ग्रामीण क्षेत्र के थे,ध्यान से सुनेंगे?कहीं हुटिगं न हो जाए! ये लड़के क्या जानें प्रचारक क्या होता है? पर मैंने उनकी इन्चार्ज से कहा आप बैठ जाइये,इन पर विश्वास करिए…और दो घंटे चले कार्यक्रम में न केवल वे सहज रहे बल्कि उत्साह व सहभागिता से भरपूर लड़कों ने स्टैडिगं ओवेशन में तालियाँ भी बजाईं।..जय हो.
*लुधियाना के ही पवनजी वनवासी कल्याण आश्रम के प्रातं प्रमुख की स्टोरी भी सुनो…”मैं तो बहुत सामान्य परिवार से था,केवल 10पड़ा था!कोई काम करना ही था तो मफतलाल के शोरूम में पानी पिलाने(चपरासी)का काम किया 6-7साल!पर सोचा पढ़ने से अच्छी नौकरी मिलेगी तो किसी तरह ग्रेजुएशन की! भाग्य ने साथ दिया तो मुझे बैकं में क्लर्क की नौकरी मिल गई।पर मेरे मन में कुछ बड़ा कर गुज़रने की थी।अत: मैंने नौकरी छोड़ने का मन बनाया व डाईगं (रंगाई) का काम शुरू किया” “अरे! इतना बड़ा रिस्क?” मेरे मुँह से सहज ही निकला!
पवन जी ने आगे बताया- “फैक्ट्री तो शुरू कर दी पर पहले 1-2 साल कठिनाइयाँ बडी आईं, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी…और आज मेरे पास कोई 300 वर्कर काम करता है!प्रभु की कृपा से 100 करोड़ का सालाना व्यापार है…संघ से बहुत प्रेरणा मिलती है…वनवासी बंधुओं की सहायता के लिए जो बन पड़ता है पंजाब से इकट्ठा कर हर साल भेजते हैं!” “कितना?”मैंने पूछा तो पता चला कम से कम 40-42लाख न्यूनतम हर साल….पुराना शेर याद आया ‘हिम्मतें मरदां, मददे खुदा..’