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गत दिनों, पंजाब विश्वविद्यालय चडींगढ़ में कश्मीरीलालजी व बंसीलाल विश्वविद्यालय भिवानीमें बोलते हुए मेरा चित्र

इस समय पर लोकसभा के चुनाव अंतिम दौर में हैं। 23 मई को स्पष्ट होगा कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है। किंतु एक परिणाम जो अब तक आ चुका है वह है कि इसमें पत्रकार बिरादरी स्पष्ट रूप से हार गई है।

पत्रकार भाइयों एवं बहनों! आपको पता ही है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा खंबा माना जाता है। अर्थात जैसे न्यायपालिका और कार्यपालिका राजनीतिक पक्ष-विपक्ष से अलग रहती है ऐसे ही पत्रकारिता से भी अपेक्षा है।

पर आप लोग तो आजकल अपना धर्म भूल केवल इस पार्टी या उस पार्टी का समर्थन करने में लगे हैं।
राजदीप,बरखादत्त,रवीश कुमार जैसे हल्के और निम्न स्तर के पत्रकारों को तो छोड़ दें, एनडीटीवी के प्रणव राय, द हिंदू के एन राम, द प्रिंट के शेखर गुप्ता द क्विंट टाइम्स ऑफ इंडिया, अरुण पुरी-इंडिया टुडे के, ये तथाकथित बड़े पत्रकार भी, अपनी मर्यादा छोड़ इस समय पर पूरी तरह से ना केवल भाजपा-मोदी विरोध में लगे हैं बल्कि समाचारों की भाषा व रिपोर्टिंग में भी बहुत निचले स्तर पर आ गए हैं।
इसकी प्रतिक्रिया में अर्णब गोस्वामी रिपब्लिक टीवी के या जीटीवी के सुधीर चौधरी आदि भी एकतरफा हो भाजपा के रंग में रंग गए हैं।
सबको पता है कि इसका सबसे प्रमुख कारण!
कांग्रेस सरकार द्वारा इन बड़े पत्रकारों को देसी और विदेशी दौरों पर मिलने वाला अथाह लाभ, हवाई यात्राओं का सुख, पिछले 5 वर्ष से मोदी सरकार में पूरी तरह से बंद जो हो गया है।

पत्रकारिता धर्म कहता है कि आप सत्य को शोध पूर्वक समाज और देश के सामने रखें, स्पष्ट बताएं।और यदि आपको अपना मत रखना है तो उसको अलग से संपादकीय में लिखें।
किंतु खबरों को तोड़ मरोड़ कर भाजपा व मोदी विरोध करना और, करते करते देश विरोधी बनने में भी आपको इन दिनों गुरेज नहीं करना,यह बहुत चिंता का विषय हो गया है।
अभी भी समय है! अगर अंग्रेजीभाषी (विशेषकर) पत्रकार बंधु-भगिनी संभले नहीं, तो एक तरफ तो यह परंपरागत मीडिया व उसके तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार अविश्वसनीयता का प्रतीक बन जाएंगे और दूसरी तरफ सोशल मीडिया का युग इन सबको पत्रकारिता क्षेत्र से ही व्यवहारिक रूप से बाहर कर देगा।
जरा सोचिए! और सुधरिए.. अभी भी समय है!