Consumption growth print for Q3FY20 GDP not in sync with quarterly earnings  | Business Standard News

प्रधानमंत्री मोदी ने तो सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मंत्राणा के बाद ही कोई कदम उठाया। लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने राहुल गांधी की शह पर प्रधानमंत्री के काम के तरीके पर सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया। – विक्रम उपाध्याय

देश में इस बात के लिए हाहाकार मचा हुआ है कि 30 जून को समाप्त तिमाही में पिछले साल के मुकाबले जीडीपी में 23.9 फीसदी की गिरावट आई है। दुनिया के लिए भी यह हतप्रभ करने वाला आकड़ा है कि आखिर किस तरह भारत की जीडीपी सबसे ज्यादा संकुचित हुई। एनडीए के विरोधियों के लिए तो यह अवसर है कि वे अपने पुराने प्रचार वाक्य को नई धार दे सके कि मोदी ने देश की अर्थव्यवस्था को बरबाद कर के रख दिया। राहुल गांधी के लिए यह बताना और आसान हो गया।आम आदमी यह नहीं समझता कि जीडीपी में संकुचन का सीधा मतलब क्या है? जीडीपी जिसे अंग्रेजी में ग्रोस डोमेस्टिक प्रोडक्ट और हिंदी में सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं, उसका सीधा सा अर्थ है देश में उत्पादित सभी औद्योगिक वस्तुओं, सेवाओं और अन्य आर्थिक सदाचारों का सामूहिक मूल्य। जिसमें सभी प्रकार के आर्थिक गतिविधियों को अलग अलग समूह में बांटकर इसका आकलन करते हैं। अब पिछले तीन महीने की बात करते हैं।

24 मार्च को प्रधानमंत्री ने देश में एक साथ संपूर्ण लॉक डाउन का ऐलान किया। यानी देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी हर चीज को बंद कर दिया गया। यहां तक कि रिक्शा, टमटम और स्कूटर साइकिल भी। इस संपूर्ण लॉक डाउन का एक ही मकसद था कि कोरोना को फैलने से रोकना। सरकार का यह पहला मकसद काफी हद तक पूरा हुआ।

अब जब जीडीपी के नंबर आ गए हैं तो सरकार विरोधी लोग सवाल कर रहे हैं कि बिना सोचे समझे मोदी ने  में संपूर्ण लॉक डाउन क्यों लगा दिया। यह भी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी के बाद तालाबंदी भी एक अपरिपक्व और गलत दिशा में लिया गया फैसला है। क्या इन लोगों के पास इस बात का भी कोई जवाब है कि भारत के अलावा दर्जनों देशों ने कोविड से बचने के लिए संपूर्ण लॉक डाउन का रास्ता क्यों चुना। जापान, साउथ कोरिया, मकाउ,वियतनाम, हांगकांग आदि देशों ने भी संपूर्ण लॉक डाउन की घोषणा की और हमारी तरह उनका भी जीडीपी नीचे की ओर गोते खा रहा है।  क्या इन देशों की सरकारें भी नासमझी में ही लॉकडाउन की हामी रहीं।

जिस समय भारत ने लॉक डाउन का ऐलान किया उस समय पूरी दुनिया के सामने एक ही उपाय था कि किसी तरह लोगों का आना जाना रोका जाए ताकि संक्रमण ना फैले। जान है तो जहान है। यह बात भारत की ओर से पूरी दुनिया तक पहुंची। जब कोरोना भारत में आया तो ना तो देश में इसकी रोकथाम की दवा थी और ना अस्पतालों में सुविधा। तैयारी का यह समय सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी को नहीं चाहिए था, सभी राज्य सरकारों को भी समय और संसाधन जुटाने के लिए वक्त चाहिए था। यदि प्रधानमंत्री मोदी का यह फैसला सही ना होता, तो सभी राज्यों के मुख्यमंत्री एक सुर में उनकी वाहवाही ना करते। राजनीतिक बयानबाजी तो तब शुरू हुई, जब इसके इलाज के लिए पर्याप्त जानकारी और गाइड लाइन के साथ केंद्र ने सभी राज्यों को साम्रगियां भी पहुंचा दी।

आलोचक यह भी कह रहे हैं कि लॉक डाउन के बावजूद भारत में कोरोना कहां रूका? मरने वाले लोगों की तादाद कहां कम हुई? तो कोई उनसे पूछे कि यदि यह सवाल सिर्फ मोदी के लिए क्यों है? राहुल गांधी ने तो मई मे ही चिल्लाना शुरू कर दिया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय यदि कोरोना को खत्म करने के लिए अकेले काम करेगा तो कोरोना कभी खत्म नहीं होगा। राज्यों को यह जिम्मेदारी दे दी जाए। प्रधानमंत्री मोदी ने तो सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मंत्रणा के बाद ही कोई कदम उठाया। लेकिन कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने राहुल गांधी की शह पर प्रधानमंत्री के काम के तरीके पर सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया। केंद्र सरकार ने 8 जून को अनलॉक 1 की घोषणा के साथ ही राज्यों को अपने हिसाब से काम करने के लिए स्वतंत्र कर दिया।

8 जून को देश भर में कोरोना के सिर्फ 2 लाख 67 हजार केस थे और इससे मरने वालों की संख्या 7,595 थी। उसके बाद क्या हुआ। दिल्ली और महाराष्ट्र में इस बात की होड़ थी कि किसके यहां कितने कोरोना के केस ज्यादा आते हैं। क्या अब भी लोग कहेंगे कि प्रधानमंत्री की नीतियों के कारण कोरोना के केस बढ़े।

अब बात आती है कि जीडीपी में गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार है? निश्चित रूप से केंद्र के उपर ही यह जिम्मेदारी है कि वह देश की अर्थव्यवस्था संभाले। लेकिन इस विकट काल में केंद्र की पहली जिम्मेदारी थी कि कोरोना से लोगों को जितना अधिक संभव हो बचाया जाए। लॉकडाउन के कारण बेरोजगारी मजदूरों, किसानों और गरीबों के लिए खाने की भरपूर व्यवस्था की जाए। जितना संभव हो उनकी आर्थिक मदद की जाए। फिर इस बंदी में व्यापारियों पर भी कोई बोझ ना डाली जाए। जिनकी पूंजी टूट चुकी है उनके लिए पूंजी की व्यवस्था की जाए। उद्योगों को फिर से विकास के पथ पर लाने के लिए वित्तीय ढ़ांचे का पुनर्गठन किया जाए। यह सभी कुछ मोदी सरकार ने समय रहते किया। और इसका परिणाम अक्टूबर तक दिखने भी लगेगा। लेकिन जीडीपी को पटरी पर या पुरानी स्थिति में लाने की जिम्मेदारी राज्यों की भी है।

16 मई को राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए कहा था कि सरकार रेटिंग की चिंता ना करते हुए लोगों की चिंता करे। रेटिंग एजेंसी भारत की रेटिंग कम करती हैं तो करे, भारत की रेटिंग यहां के किसानों से है, यहां के आम आदमी से है। अब वही राहुल गांधी कहते हैं कि मोदी ने अर्थव्यवस्था को बरबाद कर दिया। जीडीपी गिर गई। विकास रूक गया। यह विचारों का दोगलापन है।

अब जीडीपी में गिरावट का आकलन करते हैं। सभी को मालूम हैं कि देश के पांच राज्य ऐसे हैं, जिन पर भारत की 53 फीसदी जीडीपी निर्भर है। वे हैं तमिलनाडू, महाराष्ट्र, गुंजरात, उत्तरप्रदेश और आंध्र प्रदेश। तमिलनाडू भारत का ऐसा राज्य हैं जहां सबसे अधिक फैक्ट्रियां चलती हैं, अफसोस की बात है कि कोविड भी यहां सबसे अधिक है, महाराष्ट्र के बाद तमिलनाडू ही वह राज्य है, जहां कोरोना के मरीज सबसे अधिक हैं। राज्य के सभी 37 जिले कोरोना प्रभावित हैं और राजधानी चेन्नई कोरोना कैपिटल के रूप में रिकार्ड बना रहा है।

महाराष्ट्र्र और गुजरात भी कोरोना से बुरी प्रभावित हैं। वहां भी सभी तरह की आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियां चार महीने ठप रहीं। अकेले उत्तरप्रदेश ही ऐसा राज्य है जो कोरोना को महामारी नहीं बनने दिया। वहां सबसे ज्यादा मजदूर वापस लौट कर आएं। एक उत्तरप्रदेश है जो मजदूरों को उनकी दक्षता के आधार पर वर्गीकरण किया और उनका रजिस्ट्रेशन किया।

अब अनलॉक लगभग हो चुका है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी फिच ने उम्मीद जाहिर की है कि इस वर्ष जीडीपी में 10 फीसदी की गिरावट आएगीं। लेकिन इसी फिच एजेंसी ने 10 जून 2020 को यह आकलन दिया था कि भारत अगले साल 9.9 फीसदी की दर से विकास करेगा। फिर फिच ने केवल भारत को नहीं पूरी दुनिया की जीडीपी में 4 फीसदी की गिरावट का अंदाज जताया है। भारत इसी दुनिया का हिस्सा है। इसे भी समझना पड़ेगा।     

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है।)